'फलों के राजा' पर आया संकट, महाराष्ट्र-कर्नाटक में भारी नुकसान
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख आम उत्पादक क्षेत्रों में इस सीजन 'फलों के राजा' Alphonso Mango पर संकट आ गया है। उत्पादन में 85% तक की भारी गिरावट देखी जा रही है। इसकी मुख्य वजह क्लाइमेट चेंज का असर है, जिसके चलते मौसम का मिजाज बिगड़ गया है। महाराष्ट्र के मुख्य जिलों से आई रिपोर्ट्स के अनुसार, दिसंबर की ठंड, लंबे समय तक छाए बादल और महत्वपूर्ण फ्लावरिंग स्टेज के दौरान ज़्यादा नमी ने परागण (pollination) और फल लगने की प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित किया। इसी तरह, कर्नाटक में भी खराब मौसम और ओलावृष्टि ने पैदावार को लगभग 50% तक घटा दिया है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि पिछले 50 सालों में ऐसी फसल बर्बादी कभी नहीं देखी गई।
क्लाइमेट चेंज का सीधा असर, कैसे गिरी पैदावार?
इस संकट के पीछे क्लाइमेट चेंज ही मुख्य वजह है। बढ़ता तापमान और अप्रत्याशित बारिश की पैटर्न बागवानी फसलों (horticultural yields) को लगातार बाधित कर रहे हैं। स्टडीज़ बताती हैं कि फल पकने के दौरान मिनिमम तापमान में सिर्फ 1°C की बढ़ोतरी भी आम की पैदावार को 11% तक कम कर सकती है। यह संकट साफ दिखाता है कि कैसे मौसमी उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर फूल लगने और फल बनने जैसे संवेदनशील चरणों को प्रभावित करते हैं, जो तापमान, नमी और बारिश के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। इसकी वजह से आम जैसी फसलें एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स (extreme weather events) के प्रति और ज़्यादा वल्नरेबल (vulnerable) हो गई हैं।
भारत का एग्रीकल्चर मार्केट और आम का भविष्य
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक है, जो ग्लोबल आउटपुट का लगभग आधा हिस्सा है। ऐसे में यह क्लाइमेट शॉक (climate shock) तब आया है जब देश का कुल एग्रीकल्चर मार्केट बढ़ रहा है और 2026 तक इसके USD 578.89 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, इस ग्रोथ के साथ-साथ ज़मीन के छोटे टुकड़े, मिट्टी की घटती उर्वरता और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर (cold-chain infrastructure) की कमी जैसी समस्याएं भी मौजूद हैं। सरकार की ओर से फसल बीमा (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) और एग्रीकल्चर बजट में बढ़ोतरी जैसी पहलें मौजूद हैं, लेकिन वर्तमान क्लाइमेट-जनित नुकसान का पैमाना इन उपायों की परीक्षा ले रहा है। किसानों को सीधे मुआवजे की मांग की जा रही है, जो ग्रामीण समुदायों पर भारी आर्थिक दबाव को दर्शाता है।
घरेलू बाज़ार पर सीधा असर, कीमतें चढ़ीं
भारत अपनी 99% आम की खपत घरेलू स्तर पर ही करता है, और केवल 1% ही इंटरनेशनल ट्रेड में जाता है। इस वजह से प्रोडक्शन में कमी का असर लोकल मार्केट पर तुरंत और गहरा दिखता है। इस साल की कमी के कारण भारतीय उपभोक्ताओं को काफी ज़्यादा कीमतें चुकानी पड़ रही हैं। मुंबई में Alphonso Mango ₹800 से ₹2,000 प्रति दर्जन तक बिक रहे हैं, जो पिछले साल के ₹600-1,000 की तुलना में काफी ज़्यादा है। महाराष्ट्र में 80-85% और कर्नाटक में 50% प्रोडक्शन में आई गिरावट एक क्रिटिकल मोड़ का संकेत है, जो क्लाइमेट चेंज से जुड़ी एक गहरी चुनौती की ओर इशारा करता है।
भविष्य की चिंताएं और समाधान
आगे देखें तो, साउथ एशिया में तापमान बढ़ने का अनुमान है, जिससे सदी के अंत तक औसत तापमान 3.3°C तक बढ़ सकता है, और आम के फूल लगने के सीजन में यह बढ़ोतरी और तेज़ हो सकती है। यह स्थिति भारतीय आम की विभिन्न वैरायटीज़ (varieties) और पूरे हॉर्टिकल्चर सेक्टर के लिए बड़ा खतरा है। OECD-FAO एग्रीकल्चरल आउटलुक 2025-2034 के अनुसार, भारत का कुल आम उत्पादन 2034 तक 36 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है, लेकिन इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए एडाप्टेशन स्ट्रेटेजीज़ (adaptation strategies) पर निर्भर रहना होगा। क्लाइमेट-रेज़िलिएंट (climate-resilient) फसल वैरायटीज़ विकसित करना, पानी का कुशल उपयोग बढ़ाना, प्रिसिजन फार्मिंग (precision farming) के लिए डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करना और वेदर-इंडेक्स्ड इंश्योरेंस (weather-indexed insurance) जैसे रिस्क मिटिगेशन मेकैनिज़्म (risk mitigation mechanisms) को मज़बूत करना महत्वपूर्ण कदम होंगे। भारत के प्रिय 'फलों के राजा' और कृषि उत्पादन का भविष्य, तेज़ी से बदलते पर्यावरण में नेविगेट करने के लिए क्लाईमेट-स्मार्ट प्रैक्टिस (climate-smart practices) और मज़बूत पॉलिसी सपोर्ट पर निर्भर करेगा।
