भारत अब केमिकल युक्त फर्टिलाइजर से हटकर 'Biological Inputs' की तरफ बढ़ रहा है। मिट्टी की खराब होती सेहत और ग्लोबल एक्सपोर्ट मानकों को पूरा करने के लिए यह बदलाव जरूरी हो गया है। PM-PRANAM जैसी स्कीमों के बीच, निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो अपने पोर्टफोलियो में यह बदलाव कर रही हैं।
भारत का कृषि सेक्टर एक शांत लेकिन बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। दशकों तक केमिकल फर्टिलाइजर के बेतहाशा इस्तेमाल ने मिट्टी की उर्वरक शक्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश की करीब 30% जमीन अब या तो खराब हो चुकी है या रेगिस्तान में तब्दील हो रही है। मिट्टी की गिरती सेहत अब किसानों और कंपनियों दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, जिससे उन्हें पारंपरिक खेती के मॉडल को बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
नीति और ट्रेड का दबाव
बायोलॉजिकल इनपुट्स (जैसे बायो-फर्टिलाइजर और बायोस्टिमुलेंट्स) का इस्तेमाल अब सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक और कानूनी जरूरत बन गया है। सरकार की PM-PRANAM स्कीम इसमें एक बड़ा उत्प्रेरक (Catalyst) है। इसके तहत, सरकार राज्यों को केमिकल फर्टिलाइजर की खपत कम करने पर सब्सिडी की 50% बचत साझा करने का ऑफर दे रही है।
इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट का दबाव भी बड़ा कारण है। यूरोपियन यूनियन और जापान जैसे बाजारों में बासमती चावल और मसालों के लिए केमिकल रेजिड्यू की बेहद सख्त सीमाएं हैं। जब केमिकल अंशों के कारण कंसाइनमेंट रिजेक्ट होते हैं, तो एक्सपोर्टर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसी वजह से बड़े किसान अब बायोलॉजिकल क्रॉप प्रोटेक्शन प्रोडक्ट्स की तरफ झुक रहे हैं।
कंपनियों की रणनीति
भारत की प्रमुख एग्रो-केमिकल कंपनियां जैसे UPL, E.I.D. Parry, और Coromandel International अपने प्रोडक्ट पाइपलाइन में तेजी से बदलाव कर रही हैं। ये कंपनियां माइक्रोबियल साइंस और जीनोमिक-आधारित सॉल्यूशंस में निवेश कर रही हैं ताकि पौधों की न्यूट्रिएंट लेने की क्षमता को बढ़ाया जा सके। लक्ष्य एक ऐसे इंटीग्रेटेड मॉडल को बनाना है जहां बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स, केमिकल फर्टिलाइजर का विकल्प बनने के बजाय उनके साथ मिलकर काम करें।
बदलाव की चुनौतियां
इस बदलाव की राह आसान नहीं है। सबसे बड़ी बाधा है—लागत। केमिकल फर्टिलाइजर पर लंबे समय से भारी सब्सिडी मिलने के कारण वे काफी सस्ते रहे हैं। वहीं, बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स की शुरुआती कीमत अधिक होती है, जो छोटे किसानों के लिए महंगी पड़ सकती है। साथ ही, इन प्रोडक्ट्स को स्टोर करने और इस्तेमाल करने के लिए सटीक तापमान और तकनीक की जरूरत होती है। यदि इनका सही तरीके से उपयोग न किया गया, तो फसल पैदावार में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता है। निवेशकों को इस बात पर गौर करना होगा कि कंपनियां कितनी जल्दी इस कॉस्ट गैप को कम कर पाती हैं और किसान इसे कितनी तेजी से अपनाते हैं।
