भारत के Agriculture Infrastructure Fund (AIF) ने **₹1 लाख करोड़** की लैंडिंग का बड़ा माइलस्टोन पार कर लिया है। हालांकि, यह राशि देश में हर साल होने वाले **₹1.53 लाख करोड़** के पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान का केवल **65%** ही कवर कर पाती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी बाधा
फंडिंग और असल जरूरत के बीच का यह फासला आधुनिक स्टोरेज और कोल्ड-चेन की कमी की वजह से है। समस्या का एक बड़ा कारण सुविधाओं का कुछ खास राज्यों तक सीमित होना है। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) की 63% स्टोरेज क्षमता फिलहाल पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में केंद्रित है। बाकी देश के किसानों को पुरानी और मैनुअल स्टोरेज तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे फसल की क्वालिटी गिरती है और उन्हें मजबूरन सस्ते दामों पर माल बेचना पड़ता है।
बिहार जैसे राज्यों में धान की फसल का नुकसान पंजाब के मुकाबले काफी ज्यादा है। छोटे किसानों की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि 86% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है, जिससे उनके लिए मशीनीकृत खेती और वैज्ञानिक स्टोरेज अपनाना मुश्किल हो जाता है।
पॉलिसी के पेच और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट
तकनीकी क्षमता के अलावा, 'Essential Commodities Act' से जुड़ी पॉलिसी अनिश्चितता प्राइवेट सेक्टर के निवेश में बड़ी रुकावट रही है। महंगाई पर लगाम लगाने के लिए अचानक स्टॉक लिमिट लगा देने से बड़ी वेयरहाउसिंग कंपनियों के लिए लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट्स में जोखिम बढ़ जाता है। वर्तमान में स्टील साइलो (Steel Silos) जैसी आधुनिक स्टोरेज का इस्तेमाल लक्ष्य का सिर्फ 14% है। विशेषज्ञों का मानना है कि AIF फंड्स को ज्यादा नुकसान वाले जिलों पर फोकस करना चाहिए और बड़े कोल्ड चेन प्रोजेक्ट्स के लिए सब्सिडी कैप में बदलाव करना चाहिए ताकि प्राइवेट प्लेयर्स आकर्षित हों।
आगे क्या देखें?
सेक्टर के लिए सबसे बड़ी खबर यह है कि सरकार इस फंड के टारगेट को बढ़ाकर ₹2 लाख करोड़ करने पर विचार कर रही है। अब निवेशकों और जानकारों की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह अतिरिक्त पैसा उन राज्यों को मिलेगा जहां बर्बादी सबसे ज्यादा है, और क्या सरकार प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के लिए नीतिगत स्थिरता लाएगी।
