खेती का 'पैसा' क्यों नहीं बढ़ रहा?
भारत के कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जिस 'अडैप्टेशन फाइनेंस' (Adaptation Finance) की ज़रूरत है, उसमें ज़बरदस्त कमी देखी जा रही है। यह कमी किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। फिलहाल, देश के कुल अडैप्टेशन प्रयासों में पब्लिक फाइनेंस (सरकारी फंड) का दबदबा है, जो निजी निवेश की संभावनाओं को कम कर रहा है।
अडैप्टेशन फाइनेंस का बड़ा गैप
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर के चलते भारत का कृषि और खाद्य सिस्टम लगातार खतरे में है। जर्मनवॉच के क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 के अनुसार, भारत दुनिया में नौवें स्थान पर है। यह देखते हुए, विकासशील देशों के लिए ज़रूरी सालाना अडैप्टेशन फाइनेंस 2035 तक $310 से $365 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। लेकिन, इन देशों को मिलने वाला मौजूदा अंतरराष्ट्रीय पब्लिक फाइनेंस सालाना महज़ $26 बिलियन है। वहीं, कृषि-खाद्य क्षेत्र को इसकी ज़रूरत का केवल 20% ही मिल पाता है, जबकि 54% की ज़रूरत है। यह बड़ी कमी किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा को गंभीर खतरे में डालती है।
पब्लिक फाइनेंस का बोलबाला, प्राइवेट कैपिटल का अकाल
घरेलू स्तर पर, कृषि अडैप्टेशन के लिए फंड का 98-99% हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों के बजट से आता है। इसके मुकाबले, प्राइवेट सेक्टर का निवेश लगभग 1% ही है। प्राइवेट कैपिटल के इस कम निवेश की कई वजहें हैं। खेती में हमेशा से जोखिम ज़्यादा होता है, खासकर जब मौसम की घटनाएं (जैसे बाढ़, सूखा) बार-बार होती हैं। साथ ही, निवेश पर रिटर्न मिलने में लंबा समय लगता है और छोटे-छोटे बिखरे खेतों (fragmented landholdings) के कारण बड़े पैमाने पर निवेश करना मुश्किल हो जाता है। दुनिया भर में भी, प्राइवेट फाइनेंस अडैप्टेशन की कुल ज़रूरत का महज़ 3% ही पूरा कर पाता है, और इसका बड़ा हिस्सा कृषि जैसे क्षेत्रों में जाता है जहाँ सामाजिक लाभ ज़्यादा होता है लेकिन निजी निवेशकों को सीधा वित्तीय लाभ कम मिलता है।
आगे का रास्ता: GCF और नए मंच
इस गैप को पाटने की कोशिशें चल रही हैं। COP30 में, भारत समेत 13 विकासशील देशों ने ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) की मदद से एक 'कंट्री प्लेटफॉर्म' बनाने पर सहमति जताई है। इसका मकसद पब्लिक फाइनेंस, प्राइवेट निवेश और अंतरराष्ट्रीय जलवायु फंड को एक साथ लाना है। GCF भारत में जलवायु अडैप्टेशन से जुड़े प्रोजेक्ट्स को फंड भी कर रहा है। हालांकि, विकासशील देशों को मिलने वाले कुल जलवायु फंड की मात्रा अभी भी ज़रूरत से काफी कम है। GCF से भारत को काफी फंड स्वीकृत हुआ है, लेकिन इसकी जटिल प्रक्रिया और फंड मिलने में होने वाली देरी की आलोचना भी हुई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021-22 में भारत में कृषि अडैप्टेशन के लिए घरेलू फंड का एक हिस्सा लगभग ₹265 बिलियन ($3.6 बिलियन) रहा, जो कुल ज़रूरी फंड का महज़ 24% था।
सस्टेनेबल एग्री बनाम अडैप्टेशन फाइनेंस
यह समझना ज़रूरी है कि 'सस्टेनेबल एग्री' (Sustainable Agriculture) के लिए होने वाला कुल निवेश और 'क्लाइमेट अडैप्टेशन' के लिए होने वाला निवेश अलग है। FY 2020-22 के दौरान, भारत के सस्टेनेबल एग्री सेक्टर को सालाना औसतन USD 301 बिलियन मिले, जिसमें से 67% यानी USD 202 बिलियन का निवेश प्राइवेट सेक्टर से आया। यह दिखाता है कि एग्रीकल्चर में ओवरऑल प्राइवेट निवेश काफी मज़बूत है। लेकिन, 'क्लाइमेट अडैप्टेशन' के खास क्षेत्र में प्राइवेट निवेश बहुत कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अडैप्टेशन प्रोजेक्ट्स में जोखिम ज़्यादा माने जाते हैं और उनसे मिलने वाला रिटर्न स्पष्ट नहीं होता। इसलिए, यह समस्या एग्रीकल्चर के लिए प्राइवेट कैपिटल की सामान्य कमी की नहीं, बल्कि अडैप्टेशन में निवेश के जोखिम को कम करने की है।
लंबी अवधि का नज़रिया और पॉलिसी
ऐतिहासिक तौर पर, भारत ने अडैप्टेशन के लिए पब्लिक फाइनेंस पर ही ज़्यादा भरोसा किया है। अब, सरकार की नीतियां और ड्राफ्ट क्लाइमेट फाइनेंस टैक्सोनॉमी (Climate Finance Taxonomy) जैसे कदम कृषि को जलवायु अडैप्टेशन और लचीलापन बनाने वाले एक मुख्य क्षेत्र के रूप में पहचान रहे हैं। GCF के प्रोजेक्ट्स भी इसमें मदद कर रहे हैं। ब्लेंडेड फाइनेंस (Blended Finance) और जोखिम कम करने वाले मैकेनिज्म को बढ़ाने की ज़रूरत है। 'क्लाइमेट फाइनेंस नेटवर्क' की गारंटी फैसिलिटी जैसी पहलें, विशेष रूप से महिला किसानों के समूह के लिए, जोखिम साझा करके फंड को अनलॉक करने का प्रयास कर रही हैं।
वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और बाज़ार की राय
वैश्विक स्तर पर, ज़रूरत और मिलने वाले जलवायु फंड के बीच एक बड़ा गैप है। भारत जैसे विकासशील देशों को कुल जलवायु फंड का केवल 14% मिलता है, जबकि विकसित देशों को 44%। यह वैश्विक असमानता भारत की घरेलू फंडिंग चुनौतियों को और बढ़ा देती है। भारत के एग्रीटेक (Agritech) सेक्टर के लिए विश्लेषकों की राय आम तौर पर सकारात्मक है। 2025 की पहली छमाही में ही भारतीय एग्रीटेक में $1 बिलियन से ज़्यादा का वेंचर कैपिटल (Venture Capital) आया। हालांकि, यह ज़्यादातर टेक्नोलॉजी अपनाने और उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित है, न कि सीधे क्लाइमेट अडैप्टेशन पर। एग्री-टेक मार्केट 2025 में $3 बिलियन से बढ़कर 2030 तक $24 बिलियन से ज़्यादा होने का अनुमान है। यह दिखाता है कि व्यापक कृषि क्षेत्र में निवेश आ रहा है, लेकिन क्लाइमेट रेजिलिएंस (Climate Resilience) पर खास ध्यान देने की ज़रूरत है।
जोखिम भरे पहलू (The Bear Case)
कृषि अडैप्टेशन के लिए पब्लिक फाइनेंस पर अत्यधिक निर्भरता एक बड़ी संरचनात्मक कमजोरी है। यह इस बात का संकेत है कि निजी क्षेत्र को इसमें सीधे तौर पर शामिल होने में जोखिम ज़्यादा नज़र आते हैं और रिटर्न की अनिश्चितता बनी रहती है। छोटे किसानों के बिखरे खेत भी निवेश को बड़े पैमाने पर करने में बाधक हैं। ग्लोबल लेवल पर भी, प्राइवेट अडैप्टेशन फाइनेंस का एक छोटा सा हिस्सा ही कृषि जैसे क्षेत्रों में विकासशील देशों के लिए आता है। ऐसे में, महत्वपूर्ण डी-रisfileल (de-risking) मैकेनिज्म के बिना निजी पूंजी को आकर्षित करना एक चुनौती बनी रहेगी।
प्रबंधन और नीतियों के क्रियान्वयन में जोखिम
हालांकि प्रबंधन के खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं हैं, लेकिन जलवायु फंड के लिए समग्र नीति और क्रियान्वयन का माहौल जोखिम भरा है। जलवायु फंड तक पहुंच में कठिनाइयां, कृषि क्षेत्र में जलवायु कार्रवाई की योजना और निगरानी में बिखराव, और सुसंगत प्रोजेक्ट प्रस्ताव विकसित करने का सीमित अनुभव बाधाएं हैं। GCF जैसे अंतरराष्ट्रीय जलवायु फंडों की धीमी गति और जटिलता प्रशासनिक जोखिम और देरी को बढ़ाती है। भारत के महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य हैं, लेकिन उन्हें ठोस, लगातार फंडेड अडैप्टेशन प्रोजेक्ट्स में बदलना, खासकर जो निजी पूंजी को आकर्षित करें, एक बड़ी बाधा है।
प्रतिस्पर्धी भेद्यता और फंडिंग की कमी
भारत का कृषि क्षेत्र, जो जलवायु-संवेदनशील प्राकृतिक संसाधनों पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है और बड़ी आबादी को रोज़गार देता है, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है। भारत का क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स में उच्च स्थान सीधे तौर पर जलवायु-प्रेरित नुकसान को दर्शाता है, जिसका अनुमान तीन दशकों में USD 170 बिलियन लगाया गया है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, जहाँ बीमा और आपदा प्रबंधन ज़्यादा मज़बूत हो सकता है, भारत का अडैप्टेशन फाइनेंस गैप बहुत बड़ा है। पब्लिक फाइनेंस की प्रधानता का मतलब है कि अडैप्टेशन की गति सरकारी बजट चक्रों और प्राथमिकताओं से जुड़ी है, जो राजनीतिक और आर्थिक उतार-चढ़ावों के अधीन हो सकती है, और जलवायु परिवर्तन की बढ़ती और तत्काल मांगों के पीछे रह सकती है।
भविष्य की ओर एक नज़र
भारत के कृषि क्षेत्र में जलवायु फाइनेंस का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि यह अडैप्टेशन फाइनेंस के बड़े गैप को कितनी अच्छी तरह पाट पाता है। हालांकि घरेलू सस्टेनेबल एग्री फाइनेंस काफी मज़बूत है और इसमें निजी संस्थानों की भूमिका बढ़ रही है, लेकिन क्लाइमेट अडैप्टेशन का विशेष क्षेत्र अभी भी पब्लिक फंड पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। GCF-समर्थित कंट्री प्लेटफॉर्म और लक्षित डी-रisfileल मैकेनिज्म जैसी पहलों की सफलता ही प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण होगी। भारत के क्लाइमेट फाइनेंस टैक्सोनॉमी को अंतिम रूप देना और पारदर्शी वित्तीय डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करना, निवेशकों का विश्वास बनाने और निवेश निर्णयों को सूचित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा। व्यापक एग्री-टेक बाज़ार में अनुमानित वृद्धि इस बात पर निर्भर करेगी कि जलवायु लचीलापन और अडैप्टेशन को निवेश रणनीतियों में कितनी प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जाता है। उभरते बाज़ारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (EMDEs) के लिए 2030 तक सालाना $1 ट्रिलियन की बाहरी वित्तपोषण की ज़रूरत, इस जटिल वित्तीय परिदृश्य में भारत की यात्रा एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बनेगी।