भारत की 2026-27 की दालों की फसल अगस्त और सितंबर के दौरान होने वाली बारिश पर बहुत हद तक निर्भर करेगी। इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) का कहना है कि इस साल बुआई पिछले साल के मुकाबले थोड़ी कम हुई है, लेकिन फिलहाल सप्लाई स्थिर बनी हुई है। ऐसे में, निवेशकों और खाद्य महंगाई पर नजर रखने वालों के लिए मॉनसून की प्रगति पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि फसल की कमी भविष्य में आयात की जरूरतों और घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
Detailed Coverage
खरीफ दालों की बुआई और मॉनसून का असर
भारत की 2026-27 की दालों की फसल का उत्पादन अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आ गया है। इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का कहना है कि अंतिम उपज मॉनसून के पैटर्न पर ही निर्भर करेगी। खरीफ दालों की बुआई में शुरुआत में थोड़ी देरी हुई थी, लेकिन जुलाई के मध्य से इसमें तेजी आई है। हालांकि, 24 जुलाई तक कुल बुआई 84.57 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल इसी अवधि के 91.46 लाख हेक्टेयर से कम है।
मौसम विभाग का अनुमान और फसल पर खतरा
बाजार के भागीदार और नीति विश्लेषक इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) के अनुमानों पर पैनी नजर रखे हुए हैं। IMD के अनुसार, अगस्त और सितंबर में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के चेयरमैन बिमल कोठारी के मुताबिक, अगर प्रमुख खेती वाले इलाकों में पर्याप्त नमी नहीं पहुंची तो खड़ी फसलों को नुकसान का खतरा है। हालांकि, इंडस्ट्री के जानकारों का यह भी मानना है कि कभी-कभी बहुत ज्यादा बारिश से फसल खराब होने के बजाय, सही समय पर होने वाली हल्की बारिश ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है।
सप्लाई और कीमतों की स्थिरता
बुआई वाले रकबे को लेकर चिंताओं के बावजूद, फिलहाल दालों की सप्लाई की स्थिति आरामदायक बनी हुई है। अप्रैल से कई दालों की कीमतों में स्थिरता या गिरावट देखी गई है, जिससे खाद्य महंगाई पर कुछ हद तक लगाम लगी है। यह स्थिति चीनी या खाने के तेल जैसी दूसरी कमोडिटीज के मुकाबले अलग है, जहां महंगाई का दबाव ज्यादा रहा है। भारत सरकार 31 मार्च 2027 तक कुछ दालों के ड्यूटी-फ्री (Duty-Free) या ओपन इम्पोर्ट (Open Import) की इजाजत दे चुकी है। इसके चलते, किसी भी संभावित घरेलू कमी को पूरा करने के लिए देश के पास पर्याप्त बफर स्टॉक है। यह नीति उपभोक्ताओं के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और कीमतों में अचानक उछाल को रोकने के लिए बनाई गई है।
रबी सीजन 2027 के लिए लंबी अवधि के जोखिम
फिलहाल खरीफ सीजन पर ध्यान केंद्रित है, लेकिन एक्सपर्ट्स की नजरें 2027 के रबी दालों की फसल पर भी हैं। देर से होने वाली मॉनसून की बारिश से मिट्टी में नमी का स्तर बना रहता है, जो 2027 की रबी बुआई के लिए बेहद जरूरी है। अगर मॉनसून कमजोर रहा, तो सर्दियों की फसल के लिए उपलब्ध नमी कम हो सकती है, जिससे अगले साल की शुरुआत में सप्लाई की चुनौती खड़ी हो सकती है। कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के निवेशकों और व्यवसायों के लिए, आने वाले समय में देर गर्मी में वास्तविक बारिश का वितरण और मिट्टी की नमी के स्तर पर पड़ने वाले असर पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि फाइनेंशियल ईयर के आगे बढ़ने के साथ आयात सहायता की कितनी आवश्यकता पड़ेगी।
