भारतीय शुगर मिलें अब 'इंटीग्रेटेड बायो-रिफाइनरीज' बनने की राह पर हैं। प्रेस मड (press mud) को Compressed Biogas (CBG) में बदलकर कंपनियां अपनी कमाई को स्टेबल बनाने की कोशिश कर रही हैं।
भारतीय शुगर इंडस्ट्री में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। चीनी मिलें अब केवल चीनी बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि वे 'इंटीग्रेटेड बायो-रिफाइनरीज' में तब्दील हो रही हैं। इस रणनीति के तहत वे खेती से निकलने वाले वेस्ट यानी 'प्रेस मड' (press mud) का उपयोग करके बायोगैस (CBG) बना रही हैं।
क्यों लिया जा रहा है यह बड़ा रिस्क?
अब तक शुगर मिलों का मुनाफा पूरी तरह से कमोडिटी (Commodity) प्राइसेज पर निर्भर था, जो काफी अनिश्चित होता है। एनर्जी सेक्टर में कदम रखकर कंपनियां अब ऐसे रेवेन्यू स्ट्रीम्स तैयार कर रही हैं जो चीनी की कीमतों के उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हों। इसमें सरकार का GOBARdhan स्कीम और अप्रैल 2025 से लागू CBG ब्लेंडिंग नियम एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम की तरह काम कर रहे हैं।
क्या हैं चुनौतियां और रिस्क?
हालाँकि यह मॉडल सुनने में आकर्षक है, लेकिन इसके साथ कुछ बड़े रिस्क भी जुड़े हैं:
- भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर: CBG प्लांट लगाने में भारी लागत आती है, जिससे कंपनियों के कैश फ्लो और कर्ज (Debt) पर शॉर्ट टर्म में असर पड़ सकता है।
- एग्जीक्यूशन का खतरा: बायोगैस का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन भारत में अभी शुरुआती दौर में है। इसके लिए रॉ-मटीरियल की सप्लाई और रूरल एरिया में लॉजिस्टिक्स का सही तालमेल होना बहुत जरूरी है।
- पॉलिसी रिस्क: ये प्रोजेक्ट्स सरकार की सब्सिडी और बायोफ्यूल मैंडेट्स पर निर्भर हैं। भविष्य में अगर सरकारी नियमों या सब्सिडी में कोई बदलाव आता है, तो रिटर्न पर सीधा असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह
जो निवेशक शुगर सेक्टर को ट्रैक कर रहे हैं, उन्हें केवल रेवेन्यू ग्रोथ पर नहीं, बल्कि कंपनी के कर्ज के लेवल और नए प्रोजेक्ट्स के कमीशनिंग की रफ्तार पर नजर रखनी चाहिए। मिलों द्वारा किसानों को समय पर पेमेंट करना अब भी उनकी फाइनेंशियल हेल्थ का सबसे बड़ा इंडिकेटर बना रहेगा।
