भारतीय झींगा (Shrimp) एक्सपोर्टर्स के लिए बुरी खबर है। साल 2018 से अब तक अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और जापान जैसे बड़े बाजारों ने करीब **₹423 करोड़** के झींगा शिपमेंट को क्वालिटी और एंटीबायोटिक अवशेषों के चलते रिजेक्ट कर दिया है।
Detailed Coverage
क्वालिटी के कारण लगे झटके?
भारत के समुद्री खाद्य (Seafood) एक्सपोर्टर्स को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। साल 2018 से लेकर जुलाई 2026 तक, अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और जापान जैसे प्रमुख बाजारों ने भारतीय झींगा के 447 शिपमेंट को वापस भेज दिया है। इन रिजेक्ट हुए शिपमेंट की कुल कीमत करीब ₹423 करोड़ बताई जा रही है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान क्वालिटी कंप्लायंस को लेकर लगातार चुनौतियां बनी हुई हैं।
एंटीबायोटिक अवशेषों का कितना असर?
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए सबसे बड़ी रुकावट कंटैमिनेशन (Contamination) ही बनी हुई है। चालू साल में ही 17 कंसाइन्मेंट, जिनकी कीमत ₹14 करोड़ थी, रिजेक्ट किए गए। इनमें से 9 मामलों में एंटीबायोटिक अवशेषों की मौजूदगी पाई गई, जिससे करीब ₹7.45 करोड़ का सीधा नुकसान हुआ। साल 2018 से अब तक, अकेले एंटीबायोटिक से जुड़े रिजेक्शन का कुल वित्तीय नुकसान लगभग ₹176.8 करोड़ तक पहुंच गया है। केमिकल अवशेषों के अलावा, बैक्टीरियोलॉजिकल (Bacteriological) समस्याएं, खराब हैंडलिंग और ट्रांसपोर्ट के दौरान तापमान नियंत्रण में विफलता भी रिजेक्शन के कारण बने हैं।
बड़े बाजारों की सख्ती
अमेरिकी बाजार भारतीय झींगा एक्सपोर्टर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। कुल 447 रिजेक्ट हुए शिपमेंट में से 313 यानी करीब 70% अकेले अमेरिका से थे। इसके बाद यूरोपीय संघ (EU) ने 86 और जापान ने 48 कंसाइन्मेंट रिजेक्ट किए। अमेरिका, जो भारतीय झींगा के कुल सालाना एक्सपोर्ट वॉल्यूम (जो लगभग $4.8 बिलियन है) में आधे से ज़्यादा की हिस्सेदारी रखता है, आयातित समुद्री उत्पादों पर कड़ी टेस्टिंग करता है।
एक्सपोर्ट पर सरकारी रुख और आगे की राह
इन रिजेक्शन के बावजूद, सरकार का कहना है कि भारत के झींगा कंसाइन्मेंट की कुल रिजेक्शन रेट बहुत कम, यानी लगभग 0.13% है। इसका मतलब है कि ज्यादातर भारतीय समुद्री भोजन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों को पूरा करता है। हालांकि, भारतीय एक्वाकल्चर (Aquaculture) और सी-फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में निवेश करने वालों के लिए, सप्लाई चेन क्वालिटी कंट्रोल की निरंतरता और बदलती अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा रेगुलेशन का पालन करना महत्वपूर्ण रहेगा। अमेरिका या EU द्वारा इंपोर्ट नॉर्म्स (Import Norms) में किसी भी तरह की सख्ती से प्रोसेसिंग कंपनियों की कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) बढ़ सकती है, जो उनके प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकती है। भविष्य में, यह देखना होगा कि क्या इंडस्ट्री-व्यापी एंटीबायोटिक उपयोग कम करने और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर (Cold-chain Infrastructure) को बेहतर बनाने के उपाय शिपमेंट रिजेक्शन की घटनाओं को सफलतापूर्वक कम कर पाते हैं या नहीं।
