European Union में भारतीय चावल के एक्सपोर्ट पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। बीते दो सालों में पेस्टिसाइड रेसिड्यू (pesticide residues) के कारण **69%** चावल के कंसाइनमेंट फेल हुए हैं, जिससे एक्सपोर्टर्स के मुनाफे पर सीधा असर पड़ा है।
भारतीय चावल एक्सपोर्टर्स के लिए यूरोपियन मार्केट में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। 'भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस 2026' में सामने आए डेटा के मुताबिक, पिछले दो फाइनेंशियल ईयर में यूरोप भेजे गए चावल के 69% रिजेक्शन के पीछे मुख्य वजह पेस्टिसाइड रेसिड्यू रही है। यह आंकड़ा इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
एक्सपोर्टर्स पर बढ़ता आर्थिक दबाव
जब भी कोई शिपमेंट इंटरनेशनल बॉर्डर पर रिजेक्ट होती है, तो कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसमें शिपिंग का खर्च, रिटर्न लॉजिस्टिक्स और माल की कुल कीमत शामिल है। पोर्ट पर टेस्टिंग के मौजूदा मॉडल से ऑपरेशनल कॉस्ट में भारी उछाल आया है, जिससे पहले से ही कम मार्जिन वाले इस बिजनेस की प्रॉफिटेबिलिटी पर खतरा पैदा हो गया है।
अब खेत से होगी क्वालिटी चेकिंग
इन चुनौतियों से निपटने के लिए अब इंडस्ट्री 'फार्म-लेवल ट्रेसिबिलिटी' की ओर रुख कर रही है। नई रणनीति के तहत क्वालिटी कंट्रोल को पोर्ट से हटाकर सीधे खेतों तक ले जाया जाएगा। इसमें खेती के दौरान पेस्टिसाइड के इस्तेमाल और क्रॉप हिस्ट्री का पूरा रिकॉर्ड रखा जाएगा। साथ ही, मंडियों के पास मोबाइल टेस्टिंग लैब लगाने का प्रस्ताव है ताकि प्रोक्योरमेंट के समय ही चावल की क्वालिटी को चेक किया जा सके।
एक्सपोर्टर्स का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितनी जल्दी अपनी सप्लाई चेन को आधुनिक बनाते हैं। यदि समय रहते बदलाव नहीं किए गए, तो भारत का मार्केट शेयर उन देशों के पास जा सकता है जिनके क्वालिटी कंट्रोल प्रोसेस बेहतर हैं। इन्वेस्टर्स के लिए फिलहाल कंपनी के मार्जिन और नई कंप्लायंस इन्वेस्टमेंट का ट्रैक रखना सबसे जरूरी होगा।
