भारतीय पोल्ट्री एसोसिएशन ने सरकार से मक्का के ड्यूटी-फ्री आयात की मांग की है। सूखे और इथेनॉल डिमांड के कारण फीड की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिसके चलते किसानों ने जीवित चिकन के लिए **₹110 प्रति किलो** का बेस प्राइस तय किया है।
फीड की बढ़ती लागत से संकट
पोल्ट्री सेक्टर इस समय भारी वित्तीय चुनौतियों से जूझ रहा है। इंडस्ट्री का मानना है कि फीड (चारा) का खर्च कुल प्रोडक्शन लागत का 65% से 70% हिस्सा होता है, जिससे किसानों का मुनाफा काफी कम हो गया है। All India Poultry Breeders Association ने सरकार को एक औपचारिक याचिका सौंपी है, जिसमें मांग की गई है कि मक्का और सोयाबीन मील के आयात पर ड्यूटी हटाई जाए ताकि घरेलू आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके।
क्यों बढ़ रही है फीड की कीमतें?
यह संकट दो मुख्य कारणों से पैदा हुआ है। पहला, खराब मानसून ने घरेलू फसलों की पैदावार को प्रभावित किया है। दूसरा, सरकार का इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम, जिसके तहत मक्का का इस्तेमाल ईंधन बनाने में किया जा रहा है। इससे पशु आहार के लिए अनाज की उपलब्धता कम हो गई है और इनपुट लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है।
प्राइस फ्लोर की कोशिश
बाजार में स्थिति को स्थिर करने के लिए इंडस्ट्री ने जीवित चिकन के लिए ₹110 प्रति किलो का बेस प्राइस तय किया है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि प्रोडक्शन की बढ़ती लागत को कवर किया जा सके और रिटेल कीमतों को गिरने से रोका जा सके। हालांकि, त्यौहारों के बाद कमजोर मांग को देखते हुए इस कदम की सफलता पर अब भी संशय बना हुआ है।
निवेशकों के लिए जोखिम (Investor Risks)
निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या सरकार ईंधन की जरूरतों को प्राथमिकता देती है या पोल्ट्री इंडस्ट्री की खाद्य सुरक्षा को। यदि फीड की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं और रिटेल कीमतें नहीं बढ़ीं, तो कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ेगा। आने वाले दिनों में अनाज आयात नीति और पोल्ट्री कंपनियों के आगामी तिमाही नतीजों पर पैनी नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि ये नतीजे बढ़ती इनपुट लागत का आईना दिखाएंगे।
