बाज़ार खुलने की कहानी: क्या आया है समझौते में?
7 फरवरी 2026 को भारत और अमेरिका के बीच हुए इस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) से भारत के कृषि आयात (Import) परिदृश्य में एक सोची-समझी ढील देखने को मिलेगी। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री, पीयूष गोयल ने इस समझौते की जानकारी देते हुए बताया कि इसमें अमेरिका से आने वाले डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) और रेड सॉरघम (Red Sorghum) जैसे पशु आहार, साथ ही ट्री नट्स, कई तरह के फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स पर टैरिफ (Tariff) में कटौती या उन्हें पूरी तरह खत्म किया जाएगा। मंत्री गोयल ने इसे एक 'कैलिब्रेटेड' (Calibrated) कदम बताया, जिसका मकसद भारत की उन वस्तुओं के लिए बाज़ार खोलना है जिनका वह आयात करता है, खासकर पोल्ट्री जैसे क्षेत्रों का समर्थन करने के लिए। उदाहरण के लिए, DDGS का आयात पशुपालन क्षेत्र की मांग के आधार पर सीमित रहेगा, ताकि घरेलू उत्पादन को अधिक प्रभावित किए बिना आवश्यक मात्रा की आपूर्ति हो सके। यह समझौता अमेरिका की उन पुरानी चिंताओं को दूर करने का प्रयास है, जो भारत के कृषि सामानों पर आयात प्रतिबंधों को 'गैर-टैरिफ बाधाएं' (Non-Tariff Barriers) मानते रहे हैं। एक संयुक्त बयान में दोनों देशों ने व्यापार में आने वाली इन बाधाओं को दूर करने के प्रयासों को स्वीकार किया है। हालांकि, 'अतिरिक्त उत्पादों' (Additional Products) की सटीक सीमा, जिन पर टैरिफ समायोजन होगा, अभी स्पष्ट नहीं है, जिससे कुछ बाज़ार प्रतिभागी निश्चित सूचियों का इंतजार कर रहे हैं।
किसानों की चिंताएं: क्या MSP सुरक्षित है?
इस डील के बीच भारतीय किसान संगठनों में गहरी चिंता की लहर दौड़ गई है। सस्टेनेबल एंड होलीस्टिक एग्रीकल्चर (ASHA-Kisan Swaraj) जैसे संगठनों ने सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि आयातित सोयाबीन तेल और फीड सामग्री पर कम टैरिफ से भारतीय किसानों के लिए कीमतें और गिर सकती हैं। अक्टूबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, सोयाबीन की अखिल भारतीय भारित औसत बाज़ार कीमत ₹3,942 थी, जो MSP ₹5,328 से काफी 26% कम है। इसी तरह, अक्टूबर और नवंबर 2025 में मक्के के दाम औसतन ₹1,821 रहे, जो MSP ₹2,400 से लगभग 24% कम थे। किसान समूह तर्क देते हैं कि सरकार द्वारा इन फसलों की खरीद पर्याप्त नहीं रही है, जिससे किसानों को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि नया व्यापार समझौता इस स्थिति को और खराब करेगा, जिससे सरकार की अपने कृषि उत्पादकों की सुरक्षा करने की क्षमता पर संदेह पैदा होता है।
जीएम (GM) उत्पाद और निर्यात के रास्ते: फायदे या नुकसान?
समझौते में डेयरी, मांस, पोल्ट्री, सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी और कई तरह के फल व तिलहन जैसे संवेदनशील उत्पादों को टैरिफ रियायत (Tariff Concessions) से बाहर रखा गया है, जहाँ घरेलू उत्पादन क्षमता को पर्याप्त माना जाता है। हालांकि, DDGS के आयात को लेकर एक खास चिंता सामने आई है, क्योंकि अमेरिका में बने DDGS आमतौर पर आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified - GM) मक्के से बनाए जाते हैं। मंत्री गोयल ने कहा कि प्रोसेस्ड जीएम उत्पादों में कोई अवशेष नहीं बचता और पर्यावरण मंत्रालय के पास इसके लिए नियामक प्रक्रियाएं हैं। लेकिन, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियमों के तहत 24 खास फसलों से जुड़े आयात के लिए गैर-जीएम मूल प्रमाणपत्र (Non-GM Origin Certificate) की आवश्यकता होती है। यह एक संभावित टकराव का बिंदु बन सकता है, खासकर जब अमेरिका अपने जीएम कृषि निर्यात के लिए भारत में अधिक बाज़ार पहुँच की लगातार वकालत करता रहा है। निर्यात के मोर्चे पर, इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को बड़े फायदे मिलेंगे, जिसमें मसालों, चाय, कॉफी, कोपरा, नारियल तेल, सुपारी और काजू जैसे कृषि व बागान उत्पादों के लिए अमेरिकी बाज़ार में शून्य-ड्यूटी (Zero-Duty) पहुँच शामिल है। कृषि के अलावा, एक व्यापक व्यापार ढांचे के तहत, भारत पांच साल में अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों, विमानों, कीमती धातुओं और तकनीक में 500 अरब डॉलर की खरीद करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों में रणनीतिक संरेखण का संकेत देता है। ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) सहित तकनीक (Technology) उत्पादों में भी व्यापार का विस्तार होने की उम्मीद है।
अंदरूनी कमज़ोरी और अमेरिकी दबाव
कृषि बाज़ार तक पहुँच के इस 'कैलिब्रेटेड' (Calibrated) दृष्टिकोण, जिसका मकसद घरेलू प्रभाव को कम करना है, भारतीय किसानों के लिए अंदरूनी संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है। DDGS जैसे फीड इनपुट्स के लिए आयात पर निर्भरता, भले ही सीमित हो, कीमतों के जोखिम और अमेरिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) पर निर्भरता बढ़ाती है। सोयाबीन और मक्के जैसी प्रमुख फसलों के लिए बाज़ार कीमतों और MSP के बीच लगातार बने अंतर ने भारत की कृषि विपणन और खरीद प्रणाली में प्रणालीगत समस्याओं (Systemic Issues) को दर्शाया है। अमेरिकी एग्रीबिजनेस (Agribusiness) कंपनियां कीमतों के उतार-चढ़ाव को झेल सकती हैं और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं (Economies of Scale) का लाभ उठा सकती हैं, जो कई भारतीय किसानों के पास उपलब्ध नहीं है, जिससे वे आयात प्रतिस्पर्धा के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। अमेरिका की रणनीति, विशेष रूप से ऊर्जा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में बड़ी प्रतिबद्धताओं का लाभ उठाकर, जीएम उत्पादों जैसे संवेदनशील कृषि क्षेत्रों में रियायतें लेने के लिए व्यापक व्यापार सौदों का उपयोग करती है, जिससे वाशिंगटन के पास काफी दबदबा बना रहता है। प्रोसेस्ड गुड्स जैसे DDGS के लिए जीएम मूल आवश्यकताओं की सटीक परिभाषाओं और प्रवर्तन में अस्पष्टता भारत के लिए एक निरंतर नियामक चुनौती पेश करती है और भविष्य के व्यापारिक विवादों का एक संभावित रास्ता खोल सकती है, जो अतीत में भारत के बायोटेक नियमों पर अमेरिका की आपत्तियों जैसा ही है। इसके अलावा, 'अतिरिक्त उत्पादों' (Additional Products) के स्पष्टीकरण में देरी अनपेक्षित बाज़ार व्यवधान (Market Disruptions) पैदा कर सकती है।
आगे का रास्ता: उम्मीदें और चुनौतियाँ
यह अंतरिम समझौता भविष्य में गहरे व्यापारिक संबंधों की नींव रखता है, लेकिन कृषि संबंधी रियायतें घरेलू स्तर पर एक संवेदनशील मुद्दा बनी रहेंगी। जबकि संस्थागत निवेशक (Institutional Investors) भविष्य के आर्थिक सहयोग को ऊर्जा और तकनीक क्षेत्रों में बड़ी प्रतिबद्धताओं से जोड़ सकते हैं, कृषि रियायतों पर किसान वकालत समूहों और विपक्षी दलों की पैनी नज़र रहेगी। इस 'कैलिब्रेटेड' (Calibrated) बाज़ार खोलने की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार घरेलू फसलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव को कितनी अच्छी तरह प्रबंधित करती है, मजबूत खरीद तंत्र (Procurement Mechanisms) सुनिश्चित करती है, और DDGS जैसे जीएम-व्युत्पन्न उत्पादों की नियामक बारीकियों को प्रभावी ढंग से कैसे सुलझाती है। इस बीच, अमेरिका से उम्मीद की जाती है कि वह व्यापार बाधाओं, विशेष रूप से कृषि में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) को लेकर, को और हटाने के लिए दबाव बनाए रखेगा।