ग्रामीण समृद्धि ने बढ़ाई ट्रैक्टरों की डिमांड
भारत के ट्रैक्टर बाज़ार में यह ज़बरदस्त उछाल कई वजहों से आया है। वापस लौटे प्रवासी मजदूर, जो अब खेती में निवेश कर रहे हैं, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और अच्छी फसल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसा आया है। इस पैसे के चलते किसान और ग्रामीण परिवार खेती के उपकरणों में ज्यादा निवेश कर रहे हैं, और ट्रैक्टर उनकी पहली पसंद बन गए हैं।
रिकॉर्ड बिक्री और सरकारी मदद
दुनिया के सबसे बड़े ट्रैक्टर बाज़ार, भारत में घरेलू बिक्री साल 2025 में करीब 10.9 लाख यूनिट तक पहुंच गई, जो पिछले साल के मुकाबले 20% ज़्यादा है। 2025 के पहले ग्यारह महीनों में बिक्री 12% बढ़कर 10 लाख यूनिट से ऊपर निकल गई। खासकर सितंबर 2025 में, डोमेस्टिक ट्रैक्टर सेल्स में साल-दर-साल 45.39% की ज़बरदस्त बढ़त देखी गई। महिंद्रा एंड महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) जैसी बड़ी कंपनियों ने सितंबर 2025 में 50.33% की ग्रोथ दर्ज की, जिससे उनका मार्केट शेयर 44.43% हो गया। ट्रैक्टरों पर कम GST दरें भी इस ग्रोथ में सहायक साबित हुई हैं।
वैल्यूएशन और कॉम्पिटिशन का दबाव
मजबूत बिक्री के बावजूद, ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों के वैल्यूएशन पर भी नज़र है। महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) का TTM P/E रेश्यो 21.7x से 25.1x के बीच है, जो भविष्य में ग्रोथ की उम्मीद दिखाता है। वहीं, ग्लोबल कंपनी डीयर एंड कंपनी (Deere & Company) का P/E रेश्यो 31.5x से 33.0x के बीच है, जो और भी ज़्यादा ग्रोथ की उम्मीदें जताता है। एस्कॉर्ट्स कुबोटा (Escorts Kubota) का P/E रेश्यो 24.1x से 33.0x के बीच है। बाज़ार में कॉम्पिटिशन भी बढ़ रहा है, TAFE Group जैसी कंपनियां भी अच्छी बिक्री कर रही हैं, जिससे मार्केट शेयर और कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
फाइनेंसिंग और लागत की चिंताएं
हालांकि मौजूदा डिमांड ज़बरदस्त है, लेकिन लंबी अवधि की ग्रोथ और मुनाफे पर कुछ चिंताएं भी हैं। सबसे पहले, किसानों के लिए फाइनेंसिंग यानी लोन मिलना मुश्किल हो रहा है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़ (NBFCs) के लिए उधार लेने की लागत 2025 तक ऊंची रहने की उम्मीद है। बैंकों से NBFCs को मिलने वाले लोन में भी भारी कमी आई है, जो 2023 में 32% था, वहीं अगस्त 2024 तक यह घटकर सिर्फ 14% रह गया है। इससे किसानों के लिए लोन महंगा हो सकता है। दूसरे, निर्माताओं को इनपुट कॉस्ट यानी उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन दब सकता है।
भविष्य की राह
इंडस्ट्री अप्रैल 2026 से लागू होने वाले कड़े TREM V एमिशन नॉर्म्स के लिए भी तैयारी कर रही है। इससे ग्राहकों को अपने मौजूदा उपकरण अपग्रेड करने पड़ सकते हैं, जो नज़दीकी भविष्य में मांग को प्रभावित कर सकता है। एनालिस्ट्स इन बदलते वित्तीय हालातों और रेगुलेशंस पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं। जहां सेक्टर में डिमांड के मजबूत फैक्टर और सरकारी सपोर्ट है, वहीं NBFCs की तरफ से किफायती फाइनेंसिंग और बढ़ती लागतों के बीच कंपनियों के मार्जिन को बनाए रखना भविष्य की सफलता की कुंजी होगी।