Soybean Meal Market: भारत का एक्सपोर्ट गिरा, इम्पोर्ट बढ़ा! घरेलू कंपनियों पर दबाव

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AuthorAditya Rao|Published at:
Soybean Meal Market: भारत का एक्सपोर्ट गिरा, इम्पोर्ट बढ़ा! घरेलू कंपनियों पर दबाव

भारत का सोयाबीन मील (Soybean Meal) मार्केट एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां घरेलू मांग, खासकर पोल्ट्री और फूड सेक्टर से, लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ ऊंचे दामों के कारण एक्सपोर्ट में भारी गिरावट आई है। एक्सपोर्ट में **43%** की कमी और इम्पोर्ट में बढ़ोतरी ने डोमेस्टिक क्रशिंग प्लांट्स के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

घरेलू मांग में उछाल, लेकिन एक्सपोर्ट में भारी गिरावट

भारत में प्रोटीन-युक्त फीड और फूड प्रोडक्ट्स की डिमांड लगातार बढ़ रही है। अक्टूबर से जुलाई के बीच डोमेस्टिक फीड सेक्टर में करीब 53 लाख टन सोयाबीन मील की खपत हुई है। फूड सेक्टर में भी मांग बढ़कर 7.40 लाख टन तक पहुंच गई है। यह दिखाता है कि भारत में लोग ज्यादा प्रोटीन वाली चीजें खा रहे हैं।

हालांकि, इस बढ़ती मांग को पूरा करने के बावजूद, भारत से सोयाबीन मील का एक्सपोर्ट बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पिछले साल के मुकाबले एक्सपोर्ट में 43% की भारी गिरावट आई है और यह सिर्फ 9.72 लाख टन पर आ गया है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि भारत में सोयाबीन मील की कीमतें अंतरराष्ट्रीय मार्केट की तुलना में काफी ज्यादा हैं। ब्राजील, अर्जेंटीना और अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले भारतीय सोयाबीन मील महंगा साबित हो रहा है।

इस स्थिति का सीधा असर देश की सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन और क्रशिंग कंपनियों पर पड़ रहा है। जब एक्सपोर्ट कम हो जाता है और डोमेस्टिक कीमतें ज्यादा रहती हैं, तो क्रशिंग प्लांट्स का वॉल्यूम कम हो जाता है। इससे प्रति यूनिट फिक्स्ड कॉस्ट बढ़ जाती है और प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आता है।

इम्पोर्ट पर निर्भरता बढ़ी

सप्लाई में कमी भी इस बदलाव की एक बड़ी वजह है। 2025-26 के सोयाबीन प्रोडक्शन में लगभग 17% की गिरावट आई है। घरेलू सप्लाई और प्रोटीन फीड की बढ़ती मांग के बीच के अंतर को पाटने के लिए, भारत अब सोयाबीन मील का नेट इम्पोर्टर बन गया है। जहां पहले इम्पोर्ट न के बराबर होता था, वहीं अब यह बढ़कर करीब 9 लाख टन तक पहुंच गया है।

यह स्थिति इंडस्ट्री के लिए मिले-जुले असर वाली है। एक तरफ, इम्पोर्ट बढ़ने से डोमेस्टिक सप्लाई स्थिर हो जाती है और फीड की कीमतें कुछ हद तक कंट्रोल में रहती हैं। वहीं दूसरी तरफ, यह डोमेस्टिक प्रोसेसर्स को ग्लोबल प्राइस की घट-बढ़ और फॉरेन एक्सचेंज के रिस्क के सामने ला खड़ा करता है। जो कंपनियां क्रशिंग के लिए डोमेस्टिक ऑयलसीड्स पर निर्भर हैं, उन्हें इनपुट कॉस्ट को एंड-यूजर्स तक पहुंचाने में मुश्किल हो सकती है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

एग्रीकल्चरल प्रोसेसिंग सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों को आने वाले महीनों में कुछ खास बातों पर ध्यान देना चाहिए। सबसे अहम है आने वाली खरीफ फसल। मौसम भले ही अभी तक अच्छा रहा है, लेकिन फसल का असली आउटपुट ही तय करेगा कि डोमेस्टिक कीमतें ऊंची बनी रहेंगी या नीचे आएंगी। अगर नई फसल अच्छी होती है, तो कीमतें कम हो सकती हैं, जिससे एक्सपोर्ट में कुछ हद तक सुधार की उम्मीद जगेगी, हालांकि ग्लोबल बेंचमार्क कीमतें ही अंतिम फैसला करेंगी।

इसके अलावा, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन कंपनियों को सप्लाई चेन के स्थिर होने तक मार्जिन में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। यह समझना भी जरूरी होगा कि ये कंपनियां एक्सपोर्ट-केंद्रित मॉडल से इम्पोर्ट पर निर्भरता वाले मॉडल में कैसे एडजस्ट कर रही हैं। इसके लिए मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखना अहम होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.