Federation of Seed Industry of India ने 2035 तक ग्लोबल ट्रेड में अपना हिस्सा **10%** तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। अभी घरेलू मार्केट **$3.6 बिलियन** का है और अब फोकस दालों और तिलहनों की पैदावार बढ़ाने पर है।
भारतीय सीड इंडस्ट्री अब केवल घरेलू मांग तक सीमित नहीं रहना चाहती। वर्तमान में ग्लोबल ट्रेड में भारत का योगदान महज 1% है, जिसे 2035 तक बढ़ाकर 10% करने का महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया गया है। $3.6 बिलियन के घरेलू मार्केट के साथ, यह सेक्टर अब एक ग्लोबल एक्सपोर्ट हब बनने की ओर देख रहा है।
फोकस एरिया: दाल और तिलहन
इस रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा है दालों और तिलहनों की हाई-यील्ड वेराइटीज (High-yield varieties) विकसित करना। चूंकि भारत एडिबल ऑयल और दालों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, इसलिए घरेलू प्रोडक्शन बढ़ने से न सिर्फ फूड सिक्योरिटी मजबूत होगी, बल्कि एक्सपोर्ट से नई कमाई के रास्ते भी खुलेंगे।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
यह सेक्टर 'कैपिटल इंटेंसिव' है और इसमें लगातार इनोवेशन की जरूरत होती है। फिलहाल इंडस्ट्री एक 'यूनिफाइड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क' की मांग कर रही है। अब तक कंपनियों को बीज अप्रूवल में देरी और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) जैसे मुद्दों का सामना करना पड़ा है। इसके अलावा, राज्य स्तर पर बीज की कीमतों पर लगा कंट्रोल भी कंपनियों के मुनाफे और रिसर्च बजट पर असर डाल सकता है।
आगे की राह
Sathguru Management Consultants की रिपोर्ट के अनुसार, 93% सब्जी किसान पहले से ही हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब इंडस्ट्री 'National Mission on High-Yielding Seeds' के जरिए नई तकनीकों को खेत तक ले जाने की तैयारी में है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि क्या आरएंडडी (R&D) खर्च में बढ़ोतरी होती है और सरकारी नियमों में कितनी स्थिरता आती है। इन दो बिंदुओं पर ही सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी निर्भर करेगी।
