भारत-रूस मिलकर बनाएंगे यूरिया का नया प्लांट
ग्लोबल फर्टिलाइजर मार्केट में बढ़ती कीमतों और सप्लाई चेन में आ रही दिक्कतों को देखते हुए भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। भारत और रूस के बीच एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत रूस में एक बड़ा यूरिया प्रोडक्शन फैसिलिटी (Production Facility) तैयार की जाएगी। इस 50:50 जॉइंट वेंचर (Joint Venture) में रूस की Uralchem कंपनी और भारत की इंडियन पोटैश (IP), राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (RCF), और नेशनल फर्टिलाइजर्स (NF) जैसी सरकारी कंपनियां शामिल होंगी।
डील की खासियत: लागत, क्षमता और समय-सीमा
इस प्रोजेक्ट की कुल लागत ₹20,000 करोड़ आंकी गई है। इसमें से ₹10,000 करोड़ रूस की Uralchem कंपनी अमोनिया प्लांट के लिए निवेश करेगी, जबकि भारत की सरकारी कंपनियां यूरिया यूनिट के लिए ₹10,000 करोड़ लगाएंगी। रूस के समारा क्षेत्र के टोल्लियाटी (Togliatti) में लगने वाली इस प्लांट की सालाना उत्पादन क्षमता 20 लाख टन (2 MTPA) यूरिया होगी। उम्मीद है कि यह प्लांट अगले 2 साल में चालू हो जाएगा।
क्यों पड़ी इस डील की ज़रूरत?
यह बड़ा निवेश इसलिए जरूरी है क्योंकि मौजूदा समय में फर्टिलाइजर के इम्पोर्ट (Import) की लागत बहुत बढ़ गई है। भू-राजनीतिक तनाव, खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद, शिपिंग रूट्स जैसे कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में दिक्कतें बढ़ गई हैं। इसकी वजह से फर्टिलाइजर की कीमतों में भारी उछाल आया है। भारत, जो फर्टिलाइजर का एक बड़ा इम्पोर्टर है, फिलहाल $935-959 प्रति टन की दर से यूरिया खरीद रहा है, जो युद्ध से पहले की $490 प्रति टन की कीमतों से लगभग दोगुनी है। ऐसे में, भविष्य के लिए सप्लाई को सुरक्षित करना बहुत ज़रूरी हो गया है।
भविष्य की सप्लाई बनाम मौजूदा भारी कीमतें
हालांकि, यह रूस वाला जॉइंट वेंचर भविष्य में सप्लाई की स्थिरता लाएगा, लेकिन फिलहाल भारत को इम्पोर्ट के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ रही है। हालिया टेंडर्स में यूरिया की कीमतें $1,000 प्रति टन के करीब हैं, और कुछ तो $1,136 प्रति टन तक पहुंच गई हैं। 2.5 मिलियन टन यूरिया की खरीद $935-959 प्रति टन के भाव से सरकार पर बड़ा वित्तीय बोझ डाल रही है। यह अल्पावधि की चिंता, दो साल में ₹20,000 करोड़ के निवेश से 2 MTPA क्षमता वाले प्लांट की दीर्घकालिक योजना के बिल्कुल विपरीत है।
प्लांट के सामने क्या हैं चुनौतियां?
इस रूसी JV के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती भू-राजनीतिक स्थिरता बनी हुई है, जो अभी भी अनिश्चित है। पश्चिम एशिया या पूर्वी यूरोप में और संघर्ष होने से निर्माण में देरी हो सकती है और भविष्य के संचालन प्रभावित हो सकते हैं। ₹20,000 करोड़ के निवेश में लागत बढ़ने और देरी का जोखिम भी है, जो ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में आम बात है। भारत की अपनी घरेलू यूरिया उत्पादन क्षमता करीब 28.4 मिलियन टन सालाना है, लेकिन फिर भी हम करीब 10 मिलियन टन का इम्पोर्ट करते हैं। बढ़ी हुई इम्पोर्ट कीमतों के कारण सरकार पर फर्टिलाइजर सब्सिडी का बोझ भी काफी बढ़ जाएगा।
फर्टिलाइजर सेक्टर का महत्व
फर्टिलाइजर सेक्टर भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए सप्लाई चेन में निवेश लगाना आवश्यक है। इस क्षेत्र में ऊर्जा की अस्थिर लागत का भी बड़ा दबाव रहता है, क्योंकि प्राकृतिक गैस यूरिया उत्पादन की लागत का एक बड़ा हिस्सा होती है। यह रूसी JV भविष्य में यूरिया की एक विश्वसनीय आपूर्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिससे भारत को भविष्य में कीमतों में भारी उछाल से कुछ राहत मिल सकती है।
