भारत में 24 खतरनाक कीटनाशकों पर रोक नहीं! कृषि पर पड़ेगा क्या असर?

AGRICULTURE
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत में 24 खतरनाक कीटनाशकों पर रोक नहीं! कृषि पर पड़ेगा क्या असर?

भारत सरकार ने पर्यावरण को खतरे में डालने वाले 24 कीटनाशकों पर फिलहाल रोक न लगाने का फैसला किया है। यह निर्णय दीर्घकालिक मिट्टी के स्वास्थ्य और फसल की पैदावार को लेकर चिंताएं बढ़ाता है, क्योंकि ये रसायन मधुमक्खियों और केंचुओं की आबादी में गिरावट से जुड़े हैं, जो टिकाऊ खेती के लिए बेहद ज़रूरी हैं।

Detailed Coverage

पर्यावरण और कृषि के बीच संतुलन

कृषि मंत्रालय के इस फैसले ने तत्काल कृषि उत्पादकता और दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन को लेकर एक बहस छेड़ दी है। जहां मंत्रालय ने 2020 में पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए 27 रसायनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया था, वहीं 2023 के एक आदेश ने इनमें से अधिकांश के रुख को पलट दिया, जिससे उन्हें भारतीय खेतों में इस्तेमाल की अनुमति मिल गई।

परागण (Pollination) और मिट्टी पर पारिस्थितिक प्रभाव

पर्यावरणविदों और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा मुख्य चिंता परागणकों, विशेष रूप से मधुमक्खियों पर इन रसायनों के प्रभाव को लेकर है। मधुमक्खियां सरसों जैसी कई प्रमुख फसलों की पैदावार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिनकी उपस्थिति से उत्पादन में 25% से 40% तक की वृद्धि देखी गई है। जब एसफेट (acephate), थियामेथॉक्सम (thiamethoxam) और मैलाथियान (malathion) जैसे कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, तो वे मधुमक्खियों के तंत्रिका तंत्र और पाचन कार्यों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे अक्सर लकवा या बड़े पैमाने पर मौत हो जाती है।

परागण के अलावा, क्लोरपाइरिफोस (chlorpyrifos) और कार्बोफ्यूरान (carbofuran) जैसे रसायनों का उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करता है। ये पदार्थ केंचुओं की आबादी को गंभीर रूप से कम करने के लिए जाने जाते हैं, जो प्राकृतिक मिट्टी के वातन (aeration) और पोषक तत्व चक्र (nutrient cycling) के लिए मौलिक हैं। समय के साथ, मिट्टी की जीवन शक्ति में गिरावट से सिंथेटिक उर्वरकों के अधिक उपयोग की आवश्यकता हो सकती है, जिससे एक ऐसा चक्र बन सकता है जो दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को खतरे में डालता है।

उद्योग का दृष्टिकोण और नियामक संदर्भ

भारत में काम करने वाली एग्रोकेमिकल कंपनियां अक्सर तर्क देती हैं कि ये कीटनाशक फसलों को गंभीर कीट संक्रमण से बचाने के लिए आवश्यक हैं, जिससे बड़ी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। नियामक दृष्टिकोण से, सरकार का निर्णय वैज्ञानिक प्रमाणों को कृषि क्षेत्र की तत्काल मांगों के मुकाबले उत्पादकता बनाए रखने की चुनौती को दर्शाता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इनमें से कई रसायनों पर उनकी लगातार विषाक्तता के कारण सख्त प्रतिबंध या प्रतिबंध लगे हुए हैं।

घरेलू बाजार में इन पदार्थों की उपस्थिति एग्रोकेमिकल क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण निगरानी योग्य (monitorable) है। इन रसायनों का निर्माण या वितरण करने वाली कंपनियों के निवेशकों को संभावित भविष्य के नियामक परिवर्तनों पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि हरित विकल्पों या अधिक कठोर सुरक्षा मानकों की ओर सरकारी नीतियों में बदलाव उत्पाद पोर्टफोलियो को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, जैसे-जैसे वैश्विक खाद्य मानक रासायनिक अवशेषों के संबंध में अधिक कठोर होते जा रहे हैं, इन विशिष्ट कीटनाशकों का निरंतर उपयोग भारतीय कृषि उपज की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए अप्रत्यक्ष जोखिम पैदा कर सकता है। आगे बढ़ते हुए, ध्यान इस बात पर बना हुआ है कि क्या सरकार अंततः इन पदार्थों को सुरक्षित, बायो-आधारित विकल्पों के पक्ष में चरणबद्ध तरीके से समाप्त करेगी या वर्तमान नियामक ढांचे को बनाए रखेगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.