गेहूं निर्यात की शुरुआत, पर दाम बड़ी बाधा
भारत सरकार ने 2022 में खाद्य सुरक्षा की चिंताओं और बढ़ती महंगाई के कारण गेहूं निर्यात पर रोक लगा दी थी। अब, पर्याप्त घरेलू स्टॉक और अच्छी फसल के बाद, सरकार ने निर्यात की मंजूरी दे दी है। इस नीतिगत बदलाव के तहत, सरकार ने 50 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 10 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी है। हाल ही में, अप्रैल 2026 तक 2.5 मिलियन टन और निर्यात की मंजूरी मिली है।
प्रमुख कंपनी ITC ने गुजरात के कांडला पोर्ट से 22,000 मीट्रिक टन गेहूं UAE भेजा है। यह शिपमेंट करीब ₹275 प्रति टन (FOB - Free On Board) की दर से हुआ है। यह कदम बताता है कि सरकार घरेलू आपूर्ति का उपयोग करने के लिए तैयार है।
ऊंची कीमतें बन रही हैं सिरदर्द
हालांकि, इस निर्यात पर एक बड़ी रुकावट मंडरा रही है - भारतीय गेहूं की ऊंची कीमत। हालिया फसल को कुछ नुकसान की खबरों और अन्य वजहों से घरेलू कीमतें बढ़ गई हैं। बाजार के जानकारों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया और ब्लैक सी क्षेत्र से गेहूं की कीमत $290-$300 प्रति टन (CIF - Cost, Insurance, Freight) के आसपास है। इसके मुकाबले, भारतीय गेहूं करीब ₹20 प्रति टन महंगा साबित हो रहा है। यह बड़ा अंतर खरीदारों को सस्ता विकल्प चुनने पर मजबूर कर रहा है।
वैश्विक बाज़ार का असर
वैश्विक बाजार में शिपिंग लागत (Shipping Costs) में बढ़ोतरी और मध्य पूर्व (Middle East) में जारी भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Issues) ने भी कमोडिटी बाजारों को प्रभावित किया है। खाद की बढ़ती कीमतें सप्लाई चेन में बाधाओं के कारण भविष्य की फसलों पर भी असर डाल सकती हैं। हालांकि, अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) का अनुमान है कि 2025-26 में वैश्विक गेहूं उत्पादन रिकॉर्ड 844.2 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है, लेकिन इन बाहरी कारकों से अनिश्चितता बनी हुई है।
मांग सीमित रहने की उम्मीद
भारतीय गेहूं की मांग सीमित रहने की मुख्य वजह इसकी कीमत ही है। जो खरीदार 30-45 दिनों के भीतर तत्काल सप्लाई चाहते हैं, वे भारतीय गेहूं पर विचार कर सकते हैं। लेकिन, जिनके पास ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना या ब्लैक सी क्षेत्र से सस्ता गेहूं उपलब्ध है, वे भारतीय ऑफर्स से कतराएंगे। कभी भारत बड़े गेहूं निर्यातक बनने का सपना देख रहा था, लेकिन आज बढ़ती घरेलू कीमतें और शिपिंग लागत उसे इस दौड़ से पीछे खींच रही है।
ITC का अहम रोल
ITC का कृषि व्यवसाय (Agri Business) इस निर्यात में अहम भूमिका निभा रहा है। यह कंपनी सिर्फ सिगरेट या FMCG के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि कमोडिटी ट्रेडिंग में भी अपनी क्षमता दिखा रही है।
आगे का नज़रिया
कुल मिलाकर, भारतीय गेहूं निर्यात की राह आसान नहीं है। उम्मीद है कि छोटे शिपमेंट जारी रहेंगे, लेकिन वैश्विक आपूर्ति में बड़े बदलाव की संभावना कम है। भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता (Competitiveness) घरेलू कीमतों को स्थिर रखने और वैश्विक शिपिंग व इनपुट लागत में बदलाव पर निर्भर करेगी।
