भारत में रबी सीजन की बुआई के आंकड़े डराने वाले हैं। मानसून में **13%** की कमी के चलते बुआई का रकबा **46%** गिरकर **37.56 लाख हेक्टेयर** रह गया है। गेहूं और तिलहन की कम बुआई से फूड इन्फ्लेशन **10%** तक पहुंचने की आशंका है, जिसका सीधा असर रूरल डिमांड और ट्रैक्टर कंपनियों पर पड़ सकता है।
बुआई में बड़ी गिरावट और चिंताएं
कृषि क्षेत्र में तनाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 30 अक्टूबर 2026 तक कुल बुआई क्षेत्र पिछले साल के 69.02 लाख हेक्टेयर के मुकाबले गिरकर मात्र 37.56 लाख हेक्टेयर रह गया है। इस साल साउथवेस्ट मानसून में 13% की कमी के कारण मिट्टी में नमी और जलाशयों का जलस्तर ऐतिहासिक औसत से काफी नीचे है।
सबसे बुरा असर गेहूं की बुआई पर पड़ा है, जो 94% घटकर सिर्फ 19,000 हेक्टेयर रह गई है। इसके अलावा दालों और सरसों जैसे तिलहन का रकबा भी काफी कम हुआ है, जिससे आने वाले महीनों में कमोडिटी की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
इकोनॉमी और रूरल डिमांड पर असर
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस सप्लाई चेन संकट के चलते अक्टूबर-दिसंबर 2026 की तिमाही में फूड इन्फ्लेशन 10% के स्तर को छू सकती है। ग्रामीण परिवारों की खर्च योग्य आय (Disposable Income) पर इसका सीधा दबाव पड़ेगा, जो ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और एफएमसीजी (FMCG) कंपनियों के लिए खतरे की घंटी है। Escorts Kubota जैसी दिग्गज कंपनियां पहले ही कम बारिश के कारण क्षेत्रीय मांग में चुनौतियों का संकेत दे चुकी हैं।
सरकार का दखल और निवेशकों के लिए रिस्क
अगर उत्पादन में कमी जारी रहती है, तो सरकार सप्लाई को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठा सकती है। इसमें स्टॉक होल्डिंग लिमिट, ट्रेड पॉलिसी में बदलाव या एक्सपोर्ट पर पाबंदियां शामिल हो सकती हैं। निवेशकों को आने वाले समय में सरकारी आंकड़ों और रूरल कंजम्पशन के ट्रेंड्स पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
