भारत सरकार केमिकल फर्टिलाइजर पर निर्भरता घटाने के लिए जैविक कृषि को बढ़ावा दे रही है। इसका लक्ष्य रासायनिक इस्तेमाल को 25% से 50% तक कम करना है। इस बड़े बदलाव से मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा और ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा मिलेगा।
केमिकल मुक्त खेती का बड़ा लक्ष्य
भारत सरकार अब खेती में रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एक बड़ा कदम उठा रही है। देश जैविक कृषि (Bio-Agri) को बढ़ावा देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को 25% से 50% तक कम करना है। इस पहल से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होने और मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद मिलेगी। सरकार एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार कर रही है जिससे देश भर में टिकाऊ खेती (Sustainable Farming) को बढ़ावा मिल सके।
सरकारी योजनाओं से मिलेगा बढ़ावा
सरकार इस बड़े बदलाव को लाने के लिए कई बड़ी योजनाओं का सहारा ले रही है। इनमें 'परंपरागत कृषि विकास योजना' (PKVY) और 'मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन' (MOVCDNER) प्रमुख हैं। इन योजनाओं के तहत किसानों को ऑर्गेनिक तरीकों को अपनाने के लिए आर्थिक मदद और सर्टिफिकेशन की सुविधा दी जा रही है। राजस्थान में 2015 से अब तक 10,000 से ज्यादा क्लस्टर बनाए गए हैं, जिनमें 2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन शामिल है। साथ ही, RKVY के तहत 'इनोवेशन एंड एग्री-एंट्रेप्रेन्योरशिप' प्रोग्राम ने 1,700 से अधिक स्टार्टअप्स को सपोर्ट किया है, जो इस क्षेत्र में नए खिलाड़ियों के आने का संकेत देता है।
रिसर्च और रेगुलेशन पर भी फोकस
जैविक इनपुट्स को अपनाने में एक चुनौती यह भी है कि ये केमिकल फर्टिलाइजर की तरह तुरंत असर नहीं दिखाते। इस कमी को दूर करने के लिए, इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय (Agricultural Universities) बायो-पेस्टीसाइड्स की शेल्फ लाइफ और प्रभावशीलता को बेहतर बनाने पर रिसर्च कर रहे हैं। रेगुलेशन के मोर्चे पर, सरकार 'पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल' और 'इंटीग्रेटेड प्लांट न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट बिल' पर सलाह-मशविरा कर रही है। उम्मीद है कि इससे बायो-इनपुट्स के लिए एक औपचारिक और मानकीकृत बाजार तैयार होगा, जिससे निवेशकों को इस सेक्टर में स्पष्टता मिलेगी।
कृषि-इनपुट सेक्टर के लिए क्या हैं मायने?
यह बदलाव वैश्विक स्तर पर स्थिरता (Sustainability) के ट्रेंड के अनुरूप है, लेकिन यह पारंपरिक उर्वरक निर्माताओं के लिए एक नया माहौल तैयार कर रहा है। जो कंपनियां अपने पोर्टफोलियो में बायो-फर्टिलाइजर को शामिल कर रही हैं या पूरी तरह से इसी सेगमेंट पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, उनकी ग्रोथ प्रोफाइल पारंपरिक केमिकल उत्पादकों से अलग हो सकती है। इन व्यवसायों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितनी जल्दी उत्पादन क्षमता बढ़ाते हैं और स्थापित केमिकल उत्पादों के मुकाबले लागत-प्रभावी (Cost-Effective) बन पाते हैं। निवेशक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि जैसे-जैसे नए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क अंतिम रूप ले रहे हैं, कंपनियां अपने रिसर्च खर्च और उत्पाद मिश्रण को कैसे समायोजित करती हैं।
