भारत सरकार ने यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए एक बड़ा मास्टरप्लान तैयार किया है। साल 2030 तक यूरिया की क्षमता में **13.7 मिलियन टन** सालाना की बढ़ोतरी की जाएगी, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी और सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ घटेगा।
भारत अपने फर्टिलाइजर सेक्टर में एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक यूरिया का कुल घरेलू उत्पादन 43.7 मिलियन टन (mt) तक ले जाना है, जिससे देश अपनी कुल मांग का लगभग 90% हिस्सा खुद पूरा कर सकेगा। इस कदम से न केवल आयात पर निर्भरता खत्म होगी, बल्कि हर 1 मिलियन टन घरेलू यूरिया उत्पादन पर करीब $500 मिलियन विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी।
प्रमुख प्रोजेक्ट्स और PSU की भूमिका
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 'नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया-2026' का सहारा लिया जा रहा है। इसमें पब्लिक सेक्टर की कंपनियों का दबदबा है। ओडिशा में Talcher Fertilizers Ltd (GAIL, RCF और Coal India का जॉइंट वेंचर) ₹19,000 करोड़ के निवेश से कोल गैसीफिकेशन प्लांट बना रहा है, जो 2028 तक शुरू होने की उम्मीद है। इसके अलावा, Assam Valley Fertilizer and Chemical Company Ltd भी ₹10,600 करोड़ की लागत से 2030 तक एक नया प्लांट तैयार करेगी। साथ ही, रूस की JSC UralChem के साथ 2 मिलियन टन क्षमता वाले एक वेंचर पर भी बातचीत चल रही है।
सरकारी सब्सिडी पर लगाम
यह पूरा प्लान सरकारी सब्सिडी के भारी-भरकम बोझ को कम करने के लिए है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में फर्टिलाइजर सब्सिडी का आंकड़ा ₹2.17 ट्रिलियन के पार चला गया था। घरेलू उत्पादन बढ़ने से वैश्विक स्तर पर होने वाले उतार-चढ़ाव और जियो-पॉलिटिकल झटकों का असर देश के किसानों और सरकारी खजाने पर कम पड़ेगा।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Risks)
इतने बड़े प्रोजेक्ट्स में एग्जीक्यूशन रिस्क सबसे बड़ी चुनौती है। निर्माण में देरी से प्रोजेक्ट की लागत बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है। साथ ही, कोल गैसीफिकेशन प्रोजेक्ट्स पर पर्यावरण से जुड़े नियमों की कड़ी नजर रहेगी। निवेशकों को अब इन प्लांट्स की कमीशनिंग टाइमलाइन और सरकारी नीतियों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि यही आगे चलकर इन कंपनियों के लॉन्ग-टर्म रिटर्न को तय करेंगे।
