भारतीय ऑयलमील (Oilmeal) के निर्यात में मई 2026 में जोरदार वापसी देखने को मिली है। इस महीने निर्यात **18.41%** बढ़कर **3.73 लाख टन** तक पहुंच गया। इस उछाल की मुख्य वजह चीन जैसे एशियाई बाजारों से रैप्सीड मील (Rapeseed Meal) की बढ़ी हुई मांग रही।
रैप्सीड मील की धूम, सोयाबीन मील पर संकट?
यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से रैप्सीड मील की मांग में आई तेजी के कारण हुई है, जिसमें चीन एक बड़ा खरीदार बनकर उभरा है। हालांकि, दूसरी तरफ सोयाबीन मील (Soybean Meal) के निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Solvent Extractors' Association of India) के मुताबिक, भारत के सप्लायर्स को ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे दक्षिण अमेरिकी देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इन देशों की आक्रामक मूल्य निर्धारण (Aggressive Pricing) रणनीति के चलते भारतीय सोयाबीन मील की वैश्विक मांग कम हो गई है।
लॉजिस्टिक्स और लागत की मार
मासिक आंकड़ों में भले ही मई में अच्छी वृद्धि दिखी हो, लेकिन फाइनेंशियल ईयर की पहली दो महीनों (अप्रैल-मई 2026) के कुल निर्यात पर नजर डालें तो 5.37% की गिरावट आई है। इस अवधि में निर्यात घटकर 7.39 लाख टन रह गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 7.81 लाख टन था। अप्रैल में निर्यात में 20% से अधिक की गिरावट आई थी, जिसने कुल आंकड़े को प्रभावित किया।
इसके अलावा, लाल सागर (Red Sea) में जारी शिपिंग बाधाएं (Shipping Disruptions) और माल ढुलाई की बढ़ती लागत (Rising Freight Costs) ने निर्यातकों के मुनाफे पर दबाव बढ़ा दिया है। इन लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण भारतीय उत्पादों को विदेशी बाजारों तक पहुंचने में अधिक समय और पैसा लग रहा है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता प्रभावित हो रही है।
आगे क्या?
आने वाले महीनों में बाजार पर नजर रखने वालों को कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान देना होगा। इसमें ऑयलमील्स की वैश्विक कीमतें, दक्षिण अमेरिकी देशों से प्रतिस्पर्धा का स्तर, और चीन की आयात नीतियां शामिल हैं। साथ ही, मौसम पर निर्भर घरेलू तिलहन उत्पादन भी कच्चे माल की उपलब्धता और लागत को प्रभावित करेगा। शिपिंग फ्रीट रेट्स (Shipping Freight Rates) में होने वाले बदलाव भी निर्यात की संभावनाओं को तय करेंगे।
