केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्रेड डील्स (Trade Deals) पर बातचीत के दौरान देश के अन्नदाताओं के हितों को सर्वोपरि रखने की बात दोहराई है। सरकार का जोर इस बात पर है कि किसी भी तरह के आयात से घरेलू कृषि बाजार को नुकसान न पहुंचे, खासकर उन फसलों के लिए जो देश की खाद्य सुरक्षा का आधार हैं।
किसानों की सुरक्षा: एक सोची-समझी रणनीति
मंत्री चौहान ने आश्वस्त किया कि ट्रेड एग्रीमेंट्स (Trade Agreements) के तहत संवेदनशील कृषि उत्पादों, जैसे गेहूं, चावल और मक्के को आयात से पूरी तरह सुरक्षित रखा जाएगा। ये भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद अहम हैं। भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है, जिसने 15.018 करोड़ टन चावल का उत्पादन किया है।
यही नहीं, दूध, घी, दही और पनीर जैसे डेयरी उत्पादों पर भी सख्त इंपोर्ट बैन (Import Ban) लगा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्देश है कि लाखों डेयरी किसानों की रोजी-रोटी को सुरक्षित रखा जाए। सोयाबीन और मक्का जैसी फसलों पर भी कोई रियायत नहीं दी जाएगी।
कपास के मामले में, जहां घरेलू उत्पादन औद्योगिक मांग को पूरा नहीं कर पाता, वहां सीमित आयात की अनुमति है ताकि टेक्सटाइल सेक्टर (Textile Sector) को सहारा मिले, जो भारत के एक्सपोर्ट (Exports) में करीब ₹4 लाख करोड़ का योगदान देता है। राजस्थान में उगाई जाने वाली जीरा और मेथी जैसी प्रमुख मसालों की फसलों को भी आयात से बचाया गया है। बल्कि, अमेरिका जैसे बाजारों में भारतीय मसालों के लिए जीरो-ड्यूटी (Zero-Duty) एक्सेस मिल गई है, जिससे किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद है।
कंट्रोल्ड इम्पोर्ट (Controlled Import): सेब का मामला
सेब के आयात पर भारत की रणनीति काफी बारीक है। भारत सालाना करीब 5.5 लाख मीट्रिक टन सेब आयात करता है, खासकर तुर्की और ईरान से। लेकिन, अब अमेरिका से 1 लाख मीट्रिक टन तक के कोटा (Quota) को नई शर्तों के साथ मंजूरी दी गई है।
इन नई शर्तों में न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) ₹80 प्रति किलो और 25% का इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) शामिल है। इससे सेब की लैंडेड कॉस्ट (Landed Cost) लगभग ₹100 प्रति किलो तक पहुंच जाती है। यह पहले के मुकाबले अलग है, जब 50% ड्यूटी और ₹50/kg MIP के साथ लैंडेड कॉस्ट कम थी।
सरकारी अधिकारी कह रहे हैं कि यह सिर्फ सोर्सिंग (Sourcing) में मामूली बदलाव है, घरेलू उत्पादकों, खासकर हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के किसानों को इससे कोई खतरा नहीं है। हालांकि, भारतीय बागवानों की चिंता है कि यह नियंत्रित आयात भी घरेलू सेब की कीमतों को गिरा सकता है, खासकर जब बड़ी संख्या में लोग इस फसल पर निर्भर हैं। भारत में सालाना 20-21 लाख टन सेब का उत्पादन होता है, जबकि मांग 25-26 लाख टन से ज्यादा है, इसलिए आयात जरूरी है। नई ड्यूटी स्ट्रक्चर (Duty Structure) सस्ते सेबों को बाजार में आने से रोकने का एक अहम कदम है।
सेक्टर की चाल और ट्रेड बैलेंस
एग्रीकल्चर सेक्टर (Agriculture Sector) के FY26 में 3-3.5% तक बढ़ने का अनुमान है, जिसमें पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी संबद्ध गतिविधियां आय बढ़ा रही हैं। कृषि निर्यात (Agricultural Exports) में जोरदार उछाल देखा गया है, जो FY20 में $34.5 बिलियन से बढ़कर FY25 में $51.1 बिलियन हो गया है।
अमेरिका के साथ भारत का एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स (Agricultural Products) में ट्रेड सरप्लस (Trade Surplus) है, जो 2024 में $3.6 बिलियन था। हालांकि, दुनिया भर में ट्रेड प्रोटेक्शनिज्म (Trade Protectionism) बढ़ रहा है, जो कमोडिटी मार्केट (Commodity Market) को प्रभावित कर सकता है।
भारत लगातार एक बड़े ओवरऑल ट्रेड डेफिसिट (Overall Trade Deficit) से जूझ रहा है, जो जनवरी 2026 में बढ़कर $34.68 बिलियन हो गया था। टेक्सटाइल सेक्टर (Textile Sector) भी तेजी दिखा रहा है, जिसके एक्सपोर्ट ₹4 लाख करोड़ से अधिक के हैं।
भविष्य की राह: संतुलन और तरक्की
सरकार की रणनीति घरेलू जरूरतों को अंतरराष्ट्रीय ट्रेड ऑब्लिगेशन (International Trade Obligations) के साथ संतुलित करने की है। फोकस हाई-वैल्यू एग्रीकल्चर (High-value agriculture), विविधीकरण और टेक्नोलॉजी पर शिफ्ट हो रहा है।
डिजिटल फार्मिंग टूल्स (Digital Farming Tools) का इस्तेमाल 2026 तक 70% किसानों तक पहुंचने की उम्मीद है। भारत-अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड बातचीत का मकसद रणनीतिक तालमेल बिठाना है, साथ ही घरेलू हितों की रक्षा करना भी है। इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार कैसे ढाला जाता है।