Kharif Sowing: Monsoon की मार, बुवाई में 2% की गिरावट, किसानों की चिंता बढ़ी

AGRICULTURE
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Kharif Sowing: Monsoon की मार, बुवाई में 2% की गिरावट, किसानों की चिंता बढ़ी

भारत में खरीफ की बुवाई पिछले साल की तुलना में 2% पीछे चल रही है। मध्य अगस्त तक 1,000 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर बुवाई हुई है, लेकिन 12% की बारिश की कमी, खासकर धान की खेती को प्रभावित कर रही है। इससे किसानों की आय और भविष्य की खाद्य आपूर्ति पर सवाल खड़े हो गए हैं।

खरीफ बुवाई की धीमी चाल

भारत में खरीफ फसलों की बुवाई इस बार थोड़ी धीमी गति से चल रही है। मध्य अगस्त तक, बुवाई का रकबा पिछले साल के इसी समय के मुकाबले 2% कम है। कुल मिलाकर 1,000 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर बुवाई हो चुकी है, जो पिछले साल की 1,003.8 लाख हेक्टेयर से थोड़ा कम है। इस कमी की मुख्य वजह धान की खेती में आई गिरावट है, जो खरीफ फसलों का एक बड़ा हिस्सा है।

धान की खेती पर असर

चावल (धान) की बुवाई वाले रकबे में 3.65% की कमी आई है, जो अब 379.07 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। यह कमी खासकर कर्नाटक, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ज़्यादा देखी जा रही है, जहाँ बारिश कम हुई है। हालांकि, दालों और तिलहनों जैसी अन्य फसलों की बुवाई की स्थिति पिछले साल के बराबर आ गई है, जिससे कुछ राहत मिली है।

मॉनसून और जलाशयों की स्थिति

बुवाई में इस देरी का मुख्य कारण मॉनसून का असमान प्रदर्शन है। मध्य अगस्त तक, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की कुल बारिश सामान्य से 12% कम रही है। यह कमी पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में चिंता का विषय बनी हुई है। इसके अलावा, देश भर के जलाशयों में पानी का स्तर भी पिछले साल की तुलना में कम है, जिससे सिंचाई के लिए देर से होने वाली बारिश पर निर्भरता बढ़ गई है।

एग्री-इनपुट्स और महंगाई पर असर

किसानों की बुवाई की धीमी रफ्तार और बारिश की कमी का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। एग्री-इनपुट सेक्टर की कंपनियों, जैसे कि खाद, कीटनाशक और बीज बनाने वाली कंपनियों को उन इलाकों में मांग कम रहने का सामना करना पड़ सकता है जहाँ बारिश की कमी है। इसी तरह, कृषि मशीनरी और ट्रैक्टर उद्योग में भी बिक्री पर असर पड़ सकता है, क्योंकि यह अक्सर किसानों की आय से जुड़ा होता है।

फसल बुवाई में कमी से साल के अंत में खाद्य आपूर्ति में भी कमी आ सकती है, जिससे घरेलू खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। हालांकि, बुवाई के आंकड़े तो एक पहलू हैं, लेकिन अंतिम फसल का परिणाम अब अगस्त के अंत और सितंबर के मौसम पर निर्भर करेगा। निवेशकों को भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमानों पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेंगे कि देरी से बुवाई के बावजूद इन इलाकों में अच्छी फसल हो पाएगी या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.