भारत में खरीफ फसलों के तहत दालों का रकबा इस साल अगस्त के अंत तक बढ़कर **113.63 लाख हेक्टेयर** पहुंच गया है। उड़द और तुअर की बुवाई में तेजी सप्लाई के लिए राहत भरी खबर है, लेकिन अनियमित मानसून से पैदावार पर अभी भी खतरा बना हुआ है।
भारत के कृषि सेक्टर में इस बार खरीफ दालों की बुवाई ने रफ्तार पकड़ी है। 21 अगस्त 2026 तक, कुल बुवाई का एरिया 113.63 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जो पिछले साल की इसी अवधि के 112.14 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है। जुलाई में हुई बेहतर बारिश ने मानसून की देरी से आई शुरुआती सुस्ती को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
फसल का गणित और क्षेत्रीय हाल
कुल रकबे में बढ़ोतरी के पीछे उड़द और तुअर की बुवाई में आई तेजी मुख्य वजह है, जो घरेलू खपत के लिहाज से बेहद जरूरी हैं। वहीं, दूसरी ओर मूंग के रकबे में पिछले साल के मुकाबले गिरावट देखने को मिली है। क्षेत्रीय स्तर पर भी स्थितियां अलग हैं; उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड में बुवाई के आंकड़ों ने दम दिखाया है, जबकि कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों को असमान बारिश के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
पैदावार और इकोनॉमी पर असर
सिर्फ रकबा बढ़ने का मतलब ज्यादा पैदावार नहीं है। अंतिम उत्पादन पूरी तरह से मौसम पर निर्भर है, जो अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है। India Meteorological Department (IMD) ने मौसम में उतार-चढ़ाव के संकेत दिए हैं। यदि मौसम का मिजाज खराब रहा, तो इसका सीधा असर फसल की हेल्थ पर पड़ेगा। निवेशकों और मार्केट जानकारों के लिए यह स्थिति सतर्क रहने वाली है, क्योंकि अगर पैदावार प्रभावित होती है, तो दालों के दाम बढ़ सकते हैं और इसका सीधा असर रिटेल फूड इन्फ्लेशन पर देखने को मिल सकता है। अब सभी की निगाहें सीजन की आखिरी बारिश पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि क्या यह बढ़ोत्तरी असल मुनाफे में बदल पाएगी या नहीं।
