भारत की रजिस्ट्रेशन कमेटी ने Syngenta के S-metolachlor हर्बिसाइड की मंजूरी पर रोक लगा दी है। कंपनी पर कैंसर के संभावित खतरे और भूजल प्रदूषण का आरोप है। यह फैसला देश में नए एग्रोकेमिकल उत्पादों के प्रति सख्त नियामक रवैये का संकेत देता है।
क्या हैं सुरक्षा चिंताएं?
भारत सरकार की कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत काम करने वाली रजिस्ट्रेशन कमेटी (RC) ने एस-मेटोलाक्लोर टेक्निकल 96% (S-metolachlor Technical 96%) नामक हर्बिसाइड की मंजूरी प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया है। इसका मतलब है कि यह प्रोडक्ट अभी भारतीय बाजार में लॉन्च नहीं हो पाएगा। नियामकों ने कंपनी से इस केमिकल की सुरक्षा को लेकर और ज़्यादा सबूत मांगे हैं।
क्यों उठाए सवाल?
सरकार का यह फैसला हर्बिसाइड से जुड़ी खास सुरक्षा चिंताओं के बाद आया है। नियामकों द्वारा जांचे गए साइंटिफिक डेटा से पता चला है कि एस-मेटोलाक्लोर के संपर्क में आने से लैब में चूहों में लिवर ट्यूमर पाया गया। हालांकि, Syngenta, जो चीन की Sinochem Holdings का हिस्सा है, का तर्क है कि यह खतरा सिर्फ चूहों तक सीमित है, इंसानों के लिए नहीं। लेकिन, भारतीय सरकार के एक्सपर्ट पैनल ने इस दावे को खारिज कर दिया है।
नियामकों को पर्यावरण सुरक्षा को लेकर भी चिंता है। उन्हें डर है कि यह केमिकल मिट्टी में रिसकर भूजल स्रोतों को दूषित कर सकता है। भारत में यह एक संवेदनशील मुद्दा है, खासकर ग्रामीण इलाकों के लिए जो पीने के पानी और सिंचाई के लिए हैंड पंपों पर निर्भर हैं। पैनल ने यह भी नोट किया कि यूरोपीय संघ (EU) पहले ही एस-मेटोलाक्लोर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा चुका है, जिससे इसके सुरक्षा प्रोफाइल पर सवाल उठ रहे हैं।
एग्रोकेमिकल सेक्टर पर असर
Syngenta ने शुरुआत में इस प्रोडक्ट को मौजूदा हर्बिसाइड्स का ज़्यादा एफिशिएंट विकल्प बताया था, जिसके लिए कम मात्रा में इस्तेमाल की ज़रूरत होगी। कंपनी ने अमेरिका, जापान और कनाडा जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिली मंजूरी का हवाला देते हुए अपनी अर्जी का समर्थन किया था। लेकिन, भारतीय नियामकों ने साफ कर दिया है कि विदेशी मंजूरी मिलने का मतलब यह नहीं है कि प्रोडक्ट अपने आप भारतीय बाजार में आ जाएगा। यह एक बड़े ट्रेंड को दिखाता है: भारतीय अथॉरिटीज अंतरराष्ट्रीय मिसालों के बजाय स्थानीय पर्यावरण संरक्षण और पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड्स को ज़्यादा अहमियत दे रही हैं।
निवेशकों और एग्रोकेमिकल सेक्टर के लिए यह घटना नियामक माहौल को समझने में महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि सरकार इकोसिस्टम को संभावित दीर्घकालिक नुकसान से बचाने के लिए नए प्रोडक्ट एप्लीकेशन्स की बारीकी से जांच कर रही है। इस क्षेत्र की कंपनियां, जिनमें बड़ी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं, अब नए और एडवांस्ड केमिकल्स को अप्रूव कराने के लिए ज़्यादा मुश्किल और समय लेने वाले रास्ते का सामना कर सकती हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह साबित करना है कि केमिकल इंसानों और पर्यावरण के लिए सुरक्षित है। अगर कंपनी कमेटी की चिंताओं को दूर करने में नाकाम रहती है, तो प्रोडक्ट की मंजूरी में लंबी देरी हो सकती है या उसे स्थायी रूप से रिजेक्ट किया जा सकता है। एग्रोकेमिकल स्पेस के निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि क्या यह घटना इसी तरह के अन्य हर्बिसाइड्स की मंजूरी के लिए जांच को और सख्त बनाती है। मुख्य बात यह होगी कि कंपनी इन सुरक्षा मांगों से कैसे निपटती है और क्या वह भारतीय मानकों को पूरा करने के लिए अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को एडजस्ट कर पाती है।
