एक्सपोर्ट में ₹68,000 करोड़ का मुकाम हासिल
केंद्रीय मंत्री सत्य पाल सिंह बघेल ने बताया कि भारतीय फिशरीज एक्सपोर्ट (Fisheries Exports) ₹68,000 करोड़ के पार पहुंच गया है। इस ग्रोथ की एक बड़ी वजह अमेरिकी टैरिफ (Tariff) के बाद नए अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में पैठ बनाना रहा। बाजार का विस्तार एक्सपोर्ट में 25% की बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार रहा। अब भारतीय समुद्री उत्पाद यूरोप, लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व और एशिया जैसे क्षेत्रों में एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं। बता दें कि FY 2022-23 में यह आंकड़ा ₹63,969.14 करोड़ था, जबकि पिछले वर्ष यह लगभग ₹62,000 करोड़ के आसपास था।
कीमत में गिरावट, वॉल्यूम में बढ़त
हालांकि, एक्सपोर्ट के आंकड़े भले ही मजबूत दिख रहे हों, लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है। भारतीय समुद्री भोजन की प्रति किलोग्राम औसत कीमत में भारी गिरावट आई है। 2023-24 में यह कीमत 11% से ज्यादा गिरकर USD 4.14 पर आ गई, जबकि पहले यह USD 4.66 थी। इसका मतलब है कि एक्सपोर्ट वॉल्यूम बढ़ने के बावजूद कीमतें उस अनुपात में नहीं बढ़ीं, जिससे किसानों और एक्सपोर्टर्स की कमाई पर असर पड़ा है।
वैश्विक स्थान और कड़ी प्रतिस्पर्धा
भारत वैश्विक फिशरीज मार्केट में एक अहम खिलाड़ी है, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 8% हिस्सा है। 2020 में भारत टॉप समुद्री उत्पाद एक्सपोर्टर्स में से था, जिसका मूल्य USD 5.8 बिलियन से USD 6.6 बिलियन के बीच रहा। यह सेक्टर चीन, नॉर्वे और वियतनाम जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। खासकर, वियतनाम भारत का एक प्रमुख समुद्री उत्पाद सप्लायर बन गया है, जिसके एक्सपोर्ट 2025 के पहले सात महीनों में 41% से अधिक बढ़े हैं।
अमेरिकी टैरिफ का असर और EU की ओर झुकाव
अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ (जो पहले 50% या कुल 58.26% तक थे) ने व्यापार को बदल दिया। हालांकि, फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, यह टैरिफ 25% से घटाकर 18% कर दिया गया। उच्च शुल्कों के इस दौर ने बाजारों में बदलाव को मजबूर किया, जिसमें यूरोपीय संघ (EU) भारतीय झींगा (Shrimp) एक्सपोर्ट के लिए एक प्रमुख गंतव्य बन गया। EU के लिए झींगा एक्सपोर्ट 2025 के पहले 11 महीनों में 38% बढ़ा। यह मार्केट डाइवर्सिफिकेशन महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका पारंपरिक रूप से भारत के समुद्री उत्पाद एक्सपोर्ट मूल्य का लगभग 34.53% (2023-24 में) हिस्सा रहा है।
प्रमुख चुनौतियां
सेक्टर की एक बड़ी कमजोरी झींगा एक्सपोर्ट पर अत्यधिक निर्भरता है, जो भारत की समुद्री एक्सपोर्ट कमाई का 70% से अधिक हिस्सा है। यह एकाग्रता सेक्टर को कीमत में उतार-चढ़ाव, बीमारियों के प्रकोप और बदलते व्यापार नीतियों के जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके अलावा, राज्यों में बिखरा हुआ रेगुलेटरी फ्रेमवर्क प्रबंधन और संरक्षण प्रयासों को जटिल बना सकता है। प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) जैसे सरकारी इनिशिएटिव के बावजूद, अपर्याप्त कोल्ड चेन और भंडारण सुविधाओं के कारण पोस्ट-हार्वेस्ट लॉस (Post-Harvest Loss) की समस्या बनी हुई है। सेक्टर अवैध, अनरिपोर्टेड और अनरेगुलेटेड (IUU) फिशिंग और जलवायु परिवर्तन के पर्यावरणीय प्रभावों जैसे मुद्दों से भी जूझ रहा है। हालांकि भारत का एक्वाकल्चर (Aquaculture) बेस मजबूत है, लेकिन अक्सर वॉल्यूम पर ध्यान दिया गया है, जिससे हाल ही में यूनिट कीमतों में गिरावट आई है। पांच साल के भीतर फिशरीज एक्सपोर्ट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य ₹1 लाख करोड़ हासिल करना एक बड़ी चुनौती है। FY 2023-24 में एक्सपोर्ट मूल्य में कमी और मात्रा में वृद्धि की प्रवृत्ति, वॉल्यूम ग्रोथ को वित्तीय लाभ में बदलने की कठिनाई को दर्शाती है।
₹1 लाख करोड़ के लक्ष्य की ओर राह
सरकारी पहलों, जिसमें यूनियन बजट 2026-27 में महत्वपूर्ण आवंटन और PMMSY जैसी योजनाएं शामिल हैं, का उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना, तकनीक को बढ़ावा देना और मछुआरों की आजीविका में सुधार करना है। मुख्य प्रयासों में उच्च-मूल्य वाली प्रजातियों में विविधता लाना, कोल्ड चेन को मजबूत करना और ट्रैसेबिलिटी (Traceability) बढ़ाना शामिल है। ₹1 लाख करोड़ के एक्सपोर्ट लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वॉल्यूम-संचालित ग्रोथ से आगे बढ़ना, वैल्यू एडिशन बढ़ाना, मूल्य अस्थिरता का प्रबंधन करना और बाजार एकाग्रता और व्यापार बाधाओं के जोखिमों को कम करते हुए वैश्विक व्यापार परिवर्तनों के अनुकूल ढलना महत्वपूर्ण है।