मिडिल ईस्ट संकट का सीधा असर
यह स्थिति भारत की फर्टिलाइजर मार्केट पर भारी निर्भरता को साफ तौर पर उजागर करती है। मिडिल ईस्ट में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) का सीधा असर देश के खेती-किसानी क्षेत्र पर पड़ रहा है। सरकार किसानों की मदद के लिए कदम उठा रही है, लेकिन ग्लोबल सप्लाई पर देश की निर्भरता एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।
इम्पोर्ट पर भारी निर्भरता
भारत का खेती-किसानी क्षेत्र फर्टिलाइजर और उसके कच्चे माल के इम्पोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर है। मिडिल ईस्ट में तनाव ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स को बाधित कर दिया है, जो ग्लोबल फर्टिलाइजर और नेचुरल गैस ट्रेड के लिए अहम हैं। इस रुकावट ने ग्लोबल यूरिया की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है, कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक कीमतें कुछ ही महीनों में लगभग दोगुनी हो गई हैं। यूरिया प्रोडक्शन के लिए मुख्य फीडस्टॉक, यानी नेचुरल गैस की कीमतों पर भी सीधा असर पड़ा है, जिससे प्रोडक्शन कॉस्ट और बढ़ गई है। भारत अपनी फर्टिलाइजर की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट करता है, जिसमें करीब 40% यूरिया और फॉस्फेट की सप्लाई खाड़ी देशों से होती है। यह निर्भरता क्षेत्रीय अस्थिरता के प्रति सप्लाई चेन को बेहद संवेदनशील बनाती है। डोमेस्टिक रॉ मैटेरियल्स की कमी और इम्पोर्ट पर निर्भरता के चलते भारत के लिए बाहरी समस्याओं से निपटना मुश्किल हो रहा है।
सरकार पर बढ़ा वित्तीय बोझ
इम्पोर्ट कॉस्ट बढ़ने का मतलब है सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ना। मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर के लिए अनुमानित फर्टिलाइजर सब्सिडी लगभग ₹1.87 ट्रिलियन (या $19.85 बिलियन) थी। आने वाले फाइनेंशियल ईयर (FY27) के लिए अनुमान है कि यह बिल 28% तक बढ़कर ₹2.2 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है, जो ₹1.71 लाख करोड़ के बजट अनुमान से काफी ज्यादा है। FY26 के लिए संशोधित अनुमान पहले ही ₹1.86 लाख करोड़ था। यह बढ़ती लागत किसानों के लिए फर्टिलाइजर की कीमतें किफायती बनाए रखने की सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाती है, जो खाद्य सुरक्षा के लिए अहम है। हालांकि, इससे सरकारी खजाने पर काफी दबाव पड़ता है। आने वाले खरीफ सीजन के लिए फर्टिलाइजर का स्टॉक फिलहाल पर्याप्त बताया जा रहा है। लेकिन, लगातार ऊंची ग्लोबल कीमतों के चलते लगातार ध्यान देने और मजबूत इम्पोर्ट प्लान की जरूरत है।
खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर जोखिम
इम्पोर्टेड फर्टिलाइजर्स पर भारत की निर्भरता खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा करती है। सप्लाई में रुकावट या कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से किसान फर्टिलाइजर का कम इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे फसल की पैदावार और कुल एग्रीकल्चरल आउटपुट कम हो सकता है। इससे उपभोक्ताओं के लिए खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं और महंगाई बढ़ सकती है। भारत में फर्टिलाइजर के असमान इस्तेमाल की समस्या, खासकर यूरिया का अत्यधिक उपभोग, इस दिक्कत को और बढ़ाती है। भारत ने डोमेस्टिक यूरिया प्रोडक्शन कैपेसिटी का विस्तार किया है, लेकिन डी-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) जैसे अहम न्यूट्रिएंट्स के लिए यह अभी भी इम्पोर्ट पर निर्भर है। ग्लोबल फर्टिलाइजर की अफोर्डेबिलिटी पर दबाव है, क्योंकि नाइट्रोजन और फॉस्फेट की कीमतें क्रॉप की कीमतों से तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे दुनिया भर के किसानों के मुनाफे पर असर पड़ रहा है। मिडिल ईस्ट संकट ने न केवल फर्टिलाइजर की कीमतों को प्रभावित किया है, बल्कि एक महत्वपूर्ण इनपुट, यानी नेचुरल गैस की लागत को भी बढ़ाया है, जो एक बहुआयामी चुनौती पेश कर रहा है।
भविष्य की रणनीतियाँ
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारत सक्रिय रूप से इम्पोर्ट के लिए और ज्यादा अलग-अलग सोर्स खोजने और डोमेस्टिक प्रोडक्शन बढ़ाने पर काम कर रहा है। सरकारी पहलों में संसाधन-संपन्न देशों के साथ लंबी अवधि के एग्रीमेंट साइन करना और वैकल्पिक सप्लाई चेन खोजना शामिल है। डायरेक्ट सब्सिडी पेमेंट जैसे डायरेक्ट सब्सिडी पेमेंट जैसे पॉलिसी रिफॉर्म पर भी चर्चा चल रही है। इससे सरकारी वित्तीय प्रबंधन को सरल बनाने और फर्टिलाइजर के बेहतर इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, जब तक भारत फर्टिलाइजर और फीडस्टॉक का एक महत्वपूर्ण इम्पोर्टर बना रहेगा, तब तक इसका एग्रीकल्चरल सेक्टर ग्लोबल भू-राजनीतिक और मार्केट की अस्थिरता के प्रति एक्सपोज्ड रहेगा। मौजूदा संकट भारत के लिए अपनी फर्टिलाइजर सप्लाई चेन में अधिक आत्मनिर्भरता और मजबूती बनाने की जरूरत की एक जोरदार याद दिलाता है।
