भारत की फूड सिक्योरिटी पॉलिसी में बड़े बदलाव की तैयारी है। एक्सपर्ट्स अनाज के साथ-साथ अब लाइवस्टॉक (पशुपालन) को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, ताकि प्रोटीन की कमी को दूर किया जा सके। कृषि GVA में **30%** से ज्यादा का योगदान देने वाले इस सेक्टर में नई पॉलिसी से कोल्ड-चेन और क्रेडिट फ्लो बढ़ने की उम्मीद है।
प्रोटीन की कमी को दूर करने की चुनौती
भारत की खाद्य सुरक्षा का ढांचा अब तक अनाज उत्पादन पर केंद्रित रहा है, जिसने ग्रीन रिवॉल्यूशन के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाया। हालांकि, अब एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल अनाज पर निर्भरता पर्याप्त नहीं है। भारत में बढ़ती प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए सरकार अब लाइवस्टॉक (डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन) को मुख्यधारा में शामिल करने की तैयारी में है।
क्यों है यह सेक्टर खास?
लाइवस्टॉक सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था का एक साइलेंट पावरहाउस रहा है। 2014-15 से यह सालाना 7% से 7.4% की दर से बढ़ रहा है और एग्रीकल्चरल ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में इसका योगदान 30% से अधिक है। 'ऑपरेशन फ्लड' की सफलता इसका बड़ा उदाहरण है, जहां प्रति व्यक्ति दूध की खपत 1970 के 107 ग्राम से बढ़कर 2022-23 तक 459 ग्राम हो गई है।
सिस्टम में क्या है कमी?
अनाज उत्पादन की तुलना में पशुपालन अभी भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है। जहां अनाज किसानों को MSP और सरकारी खरीद का लाभ मिलता है, वहीं लाइवस्टॉक किसान बाजार की अनिश्चितता और क्रेडिट की कमी से परेशान हैं। साथ ही, क्लाइमेट चेंज या बाढ़ जैसी आपदाओं के समय इंश्योरेंस न होने से छोटे पशुपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
निवेश के लिए नए अवसर
सरकार यदि इस दिशा में कदम उठाती है, तो कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स, वेटनरी सर्विसेज और फोडर मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर के लिए निवेश के नए रास्ते खुलेंगे। निवेशकों की नजर अब इस पर है कि आने वाले बजट में सरकार लाइवस्टॉक के लिए अनाज सेक्टर जैसी ही कोई सपोर्ट पॉलिसी लाती है या नहीं।
