UN का बड़ा ऐलान: 2026 होगा 'महिला किसान वर्ष', भारत के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की तैयारी?

AGRICULTURE
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
UN का बड़ा ऐलान: 2026 होगा 'महिला किसान वर्ष', भारत के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की तैयारी?
Overview

संयुक्त राष्ट्र (UN) ने साल 2026 को 'अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष' घोषित किया है। इस ऐलान के ज़रिए भारत के कृषि क्षेत्र में महिलाओं के सामने आ रही गंभीर लैंगिक असमानताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। भले ही महिलाएं कृषि कार्यबल का **40%** से अधिक हिस्सा हों, लेकिन उनके पास केवल **14%** ज़मीन है और उन्हें क्रेडिट व सामूहिक भागीदारी में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

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ज़मीन के मालिकाना हक़ का सबसे बड़ा रोड़ा

आंकड़े एक चौंकाने वाली हकीकत बताते हैं: भारत के कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 40% से ज़्यादा है, लेकिन ज़मीन पर मालिकाना हक़ सिर्फ 14% महिलाओं का है और खेती योग्य ज़मीन का केवल 12% वे ऑपरेट करती हैं। ज़मीन के मालिकाना हक़ में यह भारी अंतर महिलाओं को सरकारी योजनाओं जैसे 'प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN)' से भी दूर रखता है, जिसके वे केवल 23% लाभार्थी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि खेती के लिए लोन (Credit), ब्याज सब्सिडी और फसल बीमा जैसी ज़रूरी चीज़ों के लिए ज़मीन का मालिकाना हक़ अक्सर पहली शर्त होती है, जो बिना ज़मीन वाली महिलाओं को फसल खराब होने या आर्थिक तंगी के वक्त बेहद असुरक्षित बना देता है।

क्रेडिट गैप को पाटने की कोशिश

ज़मीन के मालिकाना हक़ में कम हिस्सेदारी के कारण महिलाओं के लिए संस्थागत क्रेडिट (Institutional Credit) हासिल करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। NABARD जैसी संस्थाएं जागरूकता कार्यक्रमों के ज़रिए वित्तीय साक्षरता बढ़ाने और RBI के 'जमाकर्ता शिक्षा और जागरूकता फंड (DEAF)' जैसे कदम इस कमी को दूर करने में मदद कर रहे हैं। इसके अलावा, सरकार कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) और ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थानों (RSETIs) में स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स के ज़रिए क्रेडिट लेने को बढ़ावा दे रही है। 'प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना' जैसी स्कीमें भी इसमें मददगार साबित हो सकती हैं। अगर लक्षित क्रेडिट डिलीवरी नीतियां (Targeted Credit Delivery Policies) अपनाई जाएं तो इन प्रयासों का असर और बढ़ाया जा सकता है।

सामूहिक शक्ति का अहम योगदान

किसानों के समूह (Farmer Collectives) में महिलाओं की भागीदारी अभी भी काफी कम है। महिला किसानों को को-ऑपरेटिव सोसाइटीज़, फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FPOs) या महिला-केंद्रित कंपनियां बनाने या उनमें शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने से उनके संसाधन जुट सकते हैं, बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता (Economies of Scale) बढ़ सकती है और बाज़ार में मोल-भाव करने की ताकत भी मज़बूत हो सकती है।

जैसे-जैसे कृषि कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, उनके लिए संस्थागत पहचान और मज़बूत सपोर्ट स्ट्रक्चर (Support Structure) बनाना बेहद ज़रूरी हो जाता है। 'महिला किसान डिविडेंड' का सही इस्तेमाल भारत के कृषि क्षेत्र को टिकाऊ और सभी के लिए समान अवसर वाला बनाने की कुंजी हो सकता है, जो हरित क्रांति के दूसरे चरण की शुरुआत कर सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.