Directorate General of Foreign Trade (DGFT) ने शहद के लिए Minimum Export Price (MEP) को **$1,400** प्रति टन पर **31 दिसंबर, 2026** तक बढ़ा दिया है। इस फैसले का मकसद भारतीय शहद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखना है।
निर्यात नीति और मकसद
सरकार के नोटिफिकेशन नंबर 09/2026-27 के तहत यह अनिवार्य कर दिया गया है कि भारत से होने वाले शहद के हर शिपमेंट की कीमत $1,400 प्रति टन से कम नहीं होनी चाहिए। इस 'फ्लोर प्राइस' का मुख्य उद्देश्य भारतीय कंपनियों को बहुत कम दामों पर शहद बेचने से रोकना है, ताकि ग्लोबल मार्केट में भारत की साख बनी रहे।
किसानों की कमाई पर सवालिया निशान
भले ही यह कदम निर्यातकों को स्थिरता देता हो, लेकिन यह सप्लाई चेन की शुरुआत में बैठे मधुमक्खी पालकों की आय की गारंटी नहीं देता है। यह MEP नियम केवल अंतिम एक्सपोर्ट ट्रांजैक्शन पर लागू होता है, इसलिए इसमें ऐसी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है कि इसका मुनाफा सीधे किसानों तक पहुँचे।
पंजाब जैसे राज्यों में पिछले दो वर्षों में किसानों को मिलने वाली खरीद दरों में भारी गिरावट आई है। एक तरफ एक्सपोर्ट वॉल्यूम मजबूत है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को अपनी मेहनत का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है।
रिस्क और भविष्य की राह
भारतीय शहद का लगभग 76% एक्सपोर्ट अमेरिका पर निर्भर है। इस पर अत्यधिक निर्भरता भारत के लिए जोखिम भरी हो सकती है, खासकर यदि अमेरिकी व्यापार नीतियों या वैश्विक मांग में बदलाव आता है। जानकारों का मानना है कि जब तक हरियाणा की 'भवंतर भरपाई' जैसी राज्य-स्तरीय योजनाएं पूरे देश में लागू नहीं होतीं या प्राइस ट्रांसमिशन को सुधारने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए जाते, तब तक इस नीति का लाभ सिर्फ कमर्शियल एक्सपोर्टर्स तक ही सीमित रह सकता है।
