इंपोर्ट शिपिंग कॉस्ट में लगा 'आग', दाम बढ़े
The Solvent Extractors’ Association of India (SEA) ने सरकार से एडिबल ऑयल सेक्टर में बढ़ती लागतों को कम करने में मदद की गुहार लगाई है। इंडस्ट्री की मांग है कि सरकार उन्हें फ्रेट कॉस्ट सब्सिडी (freight cost subsidies) दे और इंपोर्ट शिप के लिए पोर्ट पर प्राथमिकता के आधार पर बर्थिंग (priority berthing) की सुविधा दे। यह अपील इसलिए की जा रही है क्योंकि कई ग्लोबल फैक्टर्स (global factors) के मेल से इंपोर्ट की लागतें तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन साथ ही डोमेस्टिक ऑयलसीड क्रशिंग (domestic oilseed crushing) के लिए नए अवसर भी बने हैं।
ग्लोबल शिपिंग रेट्स (global shipping rates) में भारी उछाल आया है, जो प्रमुख ट्रेड रूट्स (trade routes) पर लगभग दोगुना हो गए हैं। उदाहरण के लिए, अर्जेंटीना से भारतीय पोर्ट्स तक शिपमेंट की लागत $70-75 प्रति टन से बढ़कर अब करीब $140-145 प्रति टन हो गई है। वहीं, रूस से आने वाले शिपमेंट का खर्च $55 से बढ़कर $90-95 प्रति टन हो गया है। मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे रूट्स पर भी यह लागत $40 से बढ़कर $55 प्रति टन तक पहुंच गई है। इन बढ़ी हुई फ्रेट (freight) लागतों के कारण इंपोर्टेड एडिबल ऑयल (imported edible oil) काफी महंगे हो गए हैं। SEA के मुताबिक, 8 मई 2026 तक क्रूड पाम ऑयल (Crude Palm Oil) की कीमतें पिछले साल की तुलना में 20% बढ़कर $1250/टन पहुंच गईं। इसी तरह, सोयाबीन ऑयल (Soybean Oil) 17% बढ़कर $1295/टन और सनफ्लावर ऑयल (Sunflower Oil) 16% बढ़कर $1325/टन पर आ गया। कांडला पोर्ट पर क्रूड पाम ऑयल की कीमत भी फरवरी 2026 के अंत से लगभग 16% बढ़कर ₹1,341 प्रति 100 किलो हो गई है। इन सबका सीधा असर रिटेल कीमतों पर दिख रहा है; 11 मई 2026 तक, सनफ्लावर ऑयल ₹175.40/किलो, सोयाबीन ऑयल ₹148.87/किलो और पाम ऑयल ₹134.72/किलो के भाव बिक रहा था।
ग्लोबल फैक्टर्स और डोमेस्टिक इंडस्ट्री को फायदा
एडिविल ऑयल की कीमतों में इस उछाल के पीछे कई बड़े ग्लोबल फैक्टर्स (global factors) काम कर रहे हैं। सबसे अहम है बायोफ्यूल (biofuel) सेक्टर से बढ़ती मांग। इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश अपने बायोडीजल (biodiesel) की ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की मांग बढ़ रही है। इसके अलावा, वेस्ट एशिया (West Asia) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) के चलते क्रूड ऑयल (crude oil) की कीमतें भी बढ़ी हुई हैं, जिसका असर कमोडिटी मार्केट (commodity market), फ्रेट और करेंसी पर पड़ रहा है। भारत जैसे देश, जो एडिबल ऑयल के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं, उनकी इंपोर्ट कॉस्ट (import cost) इन वजहों से और बढ़ जाती है।
हालांकि, इन ग्लोबल प्राइस हाइक्स (price hikes) और सप्लाई इश्यूज़ (supply issues) से भारत के डोमेस्टिक ऑयलसीड क्रशिंग (domestic oilseed crushing) इंडस्ट्री को फायदा हो रहा है। इंपोर्टेड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ ही डोमेस्टिक ऑयल की कीमतें भी बढ़ रही हैं, जिससे सरसों (mustard) की कीमतें मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) ₹6,200/- प्रति क्विंटल से ऊपर बनी हुई हैं। अप्रैल 2026 में रिकॉर्ड 1.6 मिलियन टन सरसों की क्रशिंग हुई, जिसने इंपोर्टेड ऑयल के असर को कुछ हद तक कम किया है।
उपभोक्ताओं पर महंगाई की मार
डोमेस्टिक एफर्ट्स (domestic efforts) के बावजूद, देश भर में खाने के तेलों की औसत रिटेल कीमतों में पिछले साल की तुलना में 7-12% की बढ़ोतरी हुई है। सोयाबीन ऑयल 8% बढ़कर ₹159 प्रति लीटर, सरसों का तेल 12% बढ़कर ₹189 प्रति लीटर और सनफ्लावर ऑयल 8% बढ़कर ₹187 प्रति लीटर हो गया है। कुछ रिपोर्ट्स तो प्रमुख कुकिंग ऑयल (cooking oil) की कीमतों में 5-14% तक की सालाना बढ़ोतरी दिखा रही हैं। कीमतों में यह उछाल सीधे भारतीय घरों के बजट पर असर डाल रहा है, क्योंकि एडिबल ऑयल भारतीय खाने का एक अहम हिस्सा है। आपको बता दें कि भारत अपनी एडिबल ऑयल की सालाना जरूरत का लगभग 57% हिस्सा यानी 25-26 मिलियन टन आयात करता है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मलेशिया, यूक्रेन, रूस और अर्जेंटीना से आता है। आयात पर यह भारी निर्भरता देश को अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन में बाधाओं के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है।
स्ट्रक्चरल कमजोरियां और भविष्य की राह
भारत की एडिबल ऑयल इंपोर्ट पर लगभग 60% तक की निर्भरता कई बड़ी स्ट्रक्चरल कमजोरियों (structural vulnerabilities) को उजागर करती है। 2024-25 फाइनेंशियल ईयर (financial year) में एडिबल ऑयल का इंपोर्ट बिल (import bill) करीब ₹1.61 लाख करोड़ (USD 18.3 बिलियन) तक पहुंच गया था। डोमेस्टिक प्रोडक्शन (domestic production) में थोड़ी सुधार के बावजूद, आत्म निर्भरता (self-sufficiency) अभी भी केवल 44% के आसपास है। वेस्ट एशिया जैसे इलाकों में भू-राजनीतिक तनाव और एल नीनो (El Nino) जैसे जलवायु जोखिमों (climate risks) से बढ़ी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अस्थिरता भारत में महंगाई को तुरंत बढ़ा सकती है। भारत के विपरीत, कुछ बड़े उत्पादक देश बायोफ्यूल मैंडेट्स (biofuel mandates) का इस्तेमाल डोमेस्टिक डिमांड को सपोर्ट करने के लिए करते हैं, वहीं भारत को ग्लोबल प्राइस बढ़ने पर बड़े वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, मौजूदा लॉजिस्टिक्स (logistics) की समस्याएँ, जैसे कि उपयुक्त जहाजों की कमी और अनिश्चित शिपिंग रूट्स (shipping routes) के कारण मार्ग बदलना, लागत और देरी को और बढ़ा रही हैं।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स (industry experts) का अनुमान है कि 2025-26 फाइनेंशियल ईयर में डोमेस्टिक एडिबल ऑयल प्रोडक्शन करीब 9.6 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। यह देश की मांग का केवल 40% हिस्सा ही पूरा कर पाएगा, जिसका मतलब है कि लगभग 16.7 मिलियन टन ऑयल का आयात करना पड़ेगा। सरकार का नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स (NMEO) का लक्ष्य 2030-31 तक ऑयलसीड प्रोडक्शन को 69.7 मिलियन टन और एडिबल ऑयल प्रोडक्शन को 20.2 मिलियन टन तक ले जाना है। हालांकि, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निरंतर पॉलिसी सपोर्ट (policy support) और ग्लोबल सप्लाई चेन रिस्क (supply chain risks) का प्रभावी मैनेजमेंट जरूरी है। हाल ही में, प्रधानमंत्री मोदी ने इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एडिबल ऑयल की खपत घटाने की सलाह दी थी, जो ग्लोबल अनिश्चितताओं के बीच आत्म निर्भरता के लिए एक लंबी अवधि की रणनीति को दर्शाता है।
