भारत सरकार अब फर्टिलाइजर (खाद) के आयात के लिए नए स्रोत तलाश रही है और साथ ही घरेलू उत्पादन को भी बढ़ावा दे रही है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य वैश्विक बाजार में सप्लाई की अनिश्चितता के बावजूद किसानों को खाद की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
सप्लाई चेन को मजबूत करने की तैयारी
दुनिया भर में सप्लाई की अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के चलते भारत अपनी फर्टिलाइजर सप्लाई चेन को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। सरकार ने एक ऐसी रणनीति तैयार की है, जिससे आयातित खाद पर निर्भरता कम हो और किसानों को बुवाई के मौसम में किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। यह कदम देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है, क्योंकि भारत दुनिया में फर्टिलाइजर का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
सिर्फ कुछ देशों पर निर्भरता होगी खत्म
अब तक भारत कुछ चुनिंदा देशों से ही फर्टिलाइजर और इसके जरूरी कच्चे माल जैसे रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड और पोटाश का आयात करता रहा है। लेकिन अब सरकार नए सप्लायर की तलाश कर रही है ताकि किसी भी एक देश पर निर्भरता खत्म हो सके। इससे कीमतों में स्थिरता आएगी और उपलब्धता भी बेहतर होगी। यह रणनीति खरीफ और रबी दोनों फसलों के लिए खाद की आपूर्ति को सुचारू बनाने में मदद करेगी।
घरेलू उत्पादन पर भी जोर
आयात के साथ-साथ, सरकार देश में फर्टिलाइजर के उत्पादन को बढ़ाने पर भी पूरा जोर दे रही है। इसके लिए जरूरी है कि कच्चे माल की सप्लाई लंबी अवधि के लिए सुरक्षित हो। अगर घरेलू प्लांटों को समय पर कच्चा माल मिलता रहे, तो उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा। इसके अलावा, सरकार लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को भी बेहतर बना रही है ताकि आयातित या उत्पादित खाद समय पर किसानों तक पहुंच सके।
ग्लोबल कीमतों का असर होगा कम
वर्तमान में, भारत अपनी जरूरत के करीब 60% डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) का आयात करता है। ऐसे में, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ा देती है और सप्लाई में कमी का खतरा भी पैदा हो जाता है। खरीफ सीजन के लिए कुल 39.05 मिलियन टन की जरूरत के मुकाबले फिलहाल राष्ट्रीय स्टॉक लगभग 19.02 मिलियन टन है। इस स्थिति को देखते हुए, आयात स्रोतों का विविधीकरण (diversification) करना आज की जरूरत बन गया है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
फर्टिलाइजर सेक्टर की इस बदली हुई तस्वीर पर निवेशकों की भी नजर रहेगी। Coromandel International, Chambal Fertilisers और Rashtriya Chemicals and Fertilizers जैसी कंपनियों के लिए यह एक स्थिर कारोबारी माहौल बनाने में मददगार हो सकता है। हालांकि, कंपनियों को कच्चे माल की लागत, सरकारी मूल्य नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव के बीच मुनाफे का संतुलन बनाए रखना होगा।
