भारत सरकार इस हफ्ते एक बड़े फैसले पर मुहर लगा सकती है। पैराक्वाट डाइक्लोराइड (paraquat dichloride) नाम के एक ज़हरीले केमिकल पर पूरे देश में बैन (ban) लगाया जा सकता है। इस पर बढ़ती स्वास्थ्य चिंताओं और गलत इस्तेमाल की खबरों के चलते यह कदम उठाया जा रहा है।
पैराक्वाट पर बैन का फैसला -
कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) पैराक्वाट डाइक्लोराइड के भविष्य पर अंतिम निर्णय के करीब है, जिसका ऐलान इसी हफ्ते होने की उम्मीद है। पैराक्वाट एक असरदार खरपतवारनाशक (herbicide) है, लेकिन इसकी अत्यधिक विषाक्तता (toxicity) के कारण यह रेगुलेटरी बहस का विषय बन गया है। डॉक्टर्स का कहना है कि अगर यह गलती से भी पेट में चला जाए तो इसका कोई तोड़ नहीं है, और यह फेफड़ों, किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
राज्यों में पहले से लागू हैं पाबंदियां -
देशभर में बैन लगाने की यह कोशिश कई राज्यों में पहले से लागू अस्थायी पाबंदियों के बाद हो रही है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने किसानों और जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए इस केमिकल की बिक्री पर रोक लगा दी थी। वहीं, ओडिशा में इसके इस्तेमाल के लिए कड़े नियम पहले से ही लागू हैं। केरल ने भी एक बार बैन लगाने की कोशिश की थी, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण वह कामयाब नहीं हो सकी।
पिछली बार भी हुई थी चर्चा -
पैराक्वाट पहले भी रेगुलेटरी जांच के दायरे में रहा है। साल 2020 में सरकार ने 27 कीटनाशकों (pesticides) पर बैन लगाने पर विचार किया था, जिसमें पैराक्वाट भी शामिल था। हालांकि, 2023 में जारी हुई अंतिम नोटिफिकेशन में सिर्फ तीन केमिकल पर ही बैन लगाया गया था। साल 2015 में अनुपम वर्मा कमेटी की सिफारिश के बावजूद यह बहस जारी है, जिन्होंने कहा था कि अगर सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए तो इसका इस्तेमाल सुरक्षित है। लेकिन, अब इस चिंता ने जोर पकड़ ली है कि किसान फसल कटाई से ठीक पहले इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे खाने में ज़हरीले अवशेष (toxic residues) मिलने का डर है।
वैश्विक स्थिति और मार्केट पर असर -
भारत में बैन लगाने की यह मांग वैश्विक ट्रेंड के अनुरूप है, क्योंकि दुनिया के 74 देशों, जिनमें यूके और यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश शामिल हैं, ने सुरक्षा कारणों से पैराक्वाट पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है। बड़ी कंपनियां भी अपने पोर्टफोलियो में बदलाव कर रही हैं। Syngenta, जो पैराक्वाट के प्रमुख निर्माताओं में से एक रही है, जून 2026 तक इसके ग्लोबल प्रोडक्शन को बंद करने जा रही है।
भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए, यह फैसला केमिकल की लागत-प्रभावशीलता (cost-effectiveness) और स्वास्थ्य जोखिमों को संतुलित करने की चुनौती पेश करता है। कुछ लोग लेबर की कमी का हवाला देते हुए इसके इस्तेमाल को सही ठहराते हैं, क्योंकि हाथ से निराई-गुड़ाई करना महंगा और मुश्किल होता जा रहा है। लेकिन, सरकार अब स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े आंकड़ों पर गौर कर रही है, और इसका नतीजा किसानों के लिए सुरक्षित और सस्ते विकल्पों की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। जो कंपनियां भारत में पैराक्वाट बना रही हैं या बेच रही हैं, उनके लिए कृषि मंत्रालय की अंतिम सूचना बेहद अहम होगी।
