Union Department of Fisheries ने 'National Plan of Action for Sustainable Small-Scale Fisheries' (NPOA-SSF) के लिए जमीनी स्तर पर बातचीत शुरू कर दी है। इस पॉलिसी का मकसद मछुआरों को क्लाइमेट रिस्क से बचाना और संसाधनों तक उनकी पहुंच को आसान बनाना है, जिसका ड्राफ्ट नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है।
पॉलिसी में क्या है खास?
Union Department of Fisheries ने एक बड़ा फैसला लेते हुए देशव्यापी कंसल्टेशन प्रक्रिया शुरू की है। इसका उद्देश्य एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार करना है जो फिशरीज सेक्टर की इकोनॉमिक ग्रोथ और पारंपरिक मछुआरों की आजीविका के बीच संतुलन बना सके।
सेक्टर के आंकड़े और चुनौतियां
भारतीय फिशरीज सेक्टर एग्रीकल्चरल इकोनॉमी का एक मजबूत स्तंभ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 के दौरान कुल प्रोडक्शन 197.75 लाख टन तक पहुंच गया है। वहीं, 2025-26 में इस सेक्टर का एक्सपोर्ट वैल्यू ₹73,890 करोड़ दर्ज किया गया है। इन मजबूत आंकड़ों के बावजूद, सेक्टर को कोल्ड-चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी और फॉर्मल क्रेडिट (Formal Credit) न मिल पाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें यह नई पॉलिसी एड्रेस करेगी।
तकनीकी सपोर्ट और विजन
इस पूरी प्रक्रिया में Bay of Bengal Programme Inter-Governmental Organisation (BOBP-IGO) तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है, ताकि योजना Food and Agriculture Organization (FAO) के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। विशाखापत्तनम और मछलीपट्टनम जैसे तटीय इलाकों में वर्कशॉप्स के जरिए जमीनी स्तर पर जानकारी जुटाई जा रही है।
क्लाइमेट रेजिलिएंस और टाइमलाइन
नई पॉलिसी का सबसे बड़ा फोकस क्लाइमेट रेजिलिएंस पर है। बढ़ते समुद्री तापमान और चक्रवात जैसी घटनाओं से मछुआरों की सुरक्षा और उनके काम पर सीधा असर पड़ता है। सरकार 21 नवंबर 2026 को World Fisheries Day के मौके पर इसका शुरुआती ड्राफ्ट पेश कर सकती है और 2027 तक इसे फाइनल नोटिफिकेशन मिल सकता है।
