भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जलीय जीव उत्पादक, 9% ग्लोबल मार्केट पर कब्ज़ा!

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जलीय जीव उत्पादक, 9% ग्लोबल मार्केट पर कब्ज़ा!

भारत जलीय जीवों के उत्पादन में दुनिया में दूसरे नंबर पर आ गया है, और अब ग्लोबल मार्केट में इसकी हिस्सेदारी **9%** है। यह सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन निवेशकों को सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) और एक्सपोर्ट क्वालिटी (Export Quality) पर खास नज़र रखनी होगी।

क्या हुआ?

मत्स्य पालन (Fisheries) के क्षेत्र में भारत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 2024 में, भारत जलीय जीवों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बनकर उभरा है, जो दुनिया के कुल उत्पादन का 9% हिस्सा रखता है। इसके साथ ही, भारत अंतर्देशीय जल स्रोतों (inland water catches) से मछली पकड़ने में दुनिया भर में पहले स्थान पर पहुँच गया है, जहाँ से लगभग 22 लाख टन जलीय जीवों का उत्पादन हुआ है। एक्वाकल्चर (aquaculture) भी इस सेक्टर में ग्रोथ का एक बड़ा ज़रिया बना है, जिसने ग्लोबल फार्मड एक्वाटिक आउटपुट (farmed aquatic output) में 12% का योगदान दिया है।

निवेशकों के लिए क्यों है ये खास?

मत्स्य पालन सेक्टर का यह विकास भारत की 'ब्लू रेवोल्यूशन' (Blue Revolution) रणनीति से जुड़ा है। सरकार का लक्ष्य उत्पादन बढ़ाना, कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स (cold chain logistics) को बेहतर बनाना और बंदरगाहों (ports) व लैंडिंग सेंटरों (landing centers) पर इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) को मज़बूत करना है। इससे पारंपरिक, असंगठित मछली पकड़ने के तरीकों से हटकर, अब संगठित एक्वाकल्चर फार्मिंग (aquaculture farming) पर ज़ोर दिया जा रहा है। यह न केवल मछली पकड़ने में, बल्कि फिश फीड (feed), कोल्ड स्टोरेज (cold storage), ट्रांसपोर्टेशन (transportation) और सीफूड प्रोसेसिंग (seafood processing) जैसे पूरे वैल्यू चेन (value chain) में निवेश के नए अवसर पैदा कर रहा है।

सस्टेनेबिलिटी की चुनौती

उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ समुद्री जीवों की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) भी एक चिंता का विषय बन गई है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (FAO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 तक समुद्री मछली स्टॉक (marine fish stocks) का केवल 62.4% ही जैविक रूप से सस्टेनेबल स्तरों पर मछली पकड़ा जा रहा था, जो 2021 में 64.5% था। यह ट्रेंड हितधारकों (stakeholders) के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक है। यदि समुद्री स्टॉक में गिरावट जारी रहती है, तो सरकारें कड़े नियम, मौसमी प्रतिबंध या पर्यावरण अनुपालन (environmental compliance) की सख्त आवश्यकताएं लागू कर सकती हैं। इससे कंपनियों की ऑपरेटिंग कॉस्ट (operating costs) बढ़ सकती है, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है।

जोखिम और परिचालन संबंधी चिंताएं

इस उद्योग को पर्यावरणीय बदलावों के अलावा कुछ खास परिचालन जोखिमों (operational risks) का भी सामना करना पड़ता है। एक्वाकल्चर में बीमारियों का प्रकोप एक बड़ा खतरा है। उदाहरण के लिए, झींगा पालन (shrimp farming), जो भारत के एक्सपोर्ट सेगमेंट का अहम हिस्सा है, वायरल और बैक्टीरियल संक्रमणों (viral and bacterial infections) के प्रति बहुत संवेदनशील है, जिससे भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, भारतीय सीफूड इंडस्ट्री (seafood industry) का एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड (export-oriented) होना इसे अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों जैसे आयातकों (importing nations) द्वारा तय किए गए क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (quality standards) पर अत्यधिक निर्भर बनाता है। एंटीबायोटिक अवशेष (antibiotic residue) या स्वच्छता (hygiene) के मुद्दे अक्सर सख्त आयात जांच या प्रतिबंधों का कारण बनते हैं, जो सीधे एक्सपोर्टर्स के रेवेन्यू (revenue) को प्रभावित करते हैं।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

आगे बढ़ते हुए, बाज़ार के प्रतिभागियों (market participants) को कुछ प्रमुख संकेतकों पर नज़र रखनी चाहिए। पहला, 'प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना' (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana) के तहत सरकारी नीतियों और बजट आवंटन (budget allocations) पर नज़र रखें, जो इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में मदद करती है। दूसरा, एक्सपोर्ट डेटा (export data) और क्वालिटी सर्टिफिकेशन कंप्लायंस (quality certification compliance) पर ध्यान दें, क्योंकि ये प्रीमियम अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंच बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं। अंत में, एक्वाकल्चर रोग के रुझानों (aquaculture disease trends) और पर्यावरणीय सस्टेनेबिलिटी प्रथाओं (environmental sustainability practices) पर रिपोर्टों की निगरानी करें, क्योंकि ये सेक्टर में कंपनियों की दीर्घकालिक परिचालन व्यवहार्यता (operational viability) को परिभाषित करेंगे।

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