भारत के कृषि निर्यात को अमेरिका में मिली बड़ी राहत! 75% उत्पादों पर जीरो टैरिफ, व्यापार सरप्लस को मिलेगी उड़ान

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत के कृषि निर्यात को अमेरिका में मिली बड़ी राहत! 75% उत्पादों पर जीरो टैरिफ, व्यापार सरप्लस को मिलेगी उड़ान
Overview

SBI की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत से अमेरिका को होने वाले कृषि निर्यात में ज़बरदस्त तेज़ी आने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अब अमेरिका बाज़ार में 75% ज़रूरी कृषि उत्पादों पर कोई टैरिफ (शुल्क) नहीं लगेगा। इस फैसले से भारत के मौजूदा $1.3 बिलियन के कृषि व्यापार सरप्लस को और भी मज़बूती मिलने की उम्मीद है। चावल, मसाले, चाय, कॉफी और मछली जैसे प्रमुख सेक्टरों को इससे सीधा फायदा होगा, जिससे किसानों की आय और निर्यात की मात्रा, दोनों में इज़ाफा होगा।

मुख्य वजह: टैरिफ का खात्मा, एक्सपोर्ट में ज़बरदस्त तेज़ी

भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते ने भारतीय कृषि उत्पादों के लिए अमेरिकी बाज़ार के दरवाज़े खोल दिए हैं। रिपोर्ट बताती है कि अब 75% तक योग्य निर्यात, यानी लगभग $1.36 बिलियन के कृषि सामान, अमेरिका में बिना किसी टैरिफ के पहुँचेंगे। यह बड़ा कदम 12 फरवरी, 2026 को सामने आई SBI की रिपोर्ट में कन्फर्म हुआ है। समझौते के तहत, भारत से $1.035 बिलियन के कृषि उत्पादों पर भी अमेरिका ज़ीरो टैरिफ लगाएगा, जिससे भारतीय किसानों और निर्यातकों के लिए व्यापार में स्थिरता आएगी। इस नीतिगत बदलाव का मकसद भारतीय उत्पादों की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाना, बाज़ार का दायरा फैलाना और एक्सपोर्ट की मात्रा में बढ़ोतरी करना है, जिससे अमेरिका के साथ भारत का $1.3 बिलियन का मौजूदा कृषि व्यापार सरप्लस और भी मज़बूत होगा।

सेक्टर-वार असर और वैश्विक तस्वीर

टैरिफ में इस बड़ी कटौती का फायदा अलग-अलग कृषि सेक्टरों पर पड़ेगा। चावल जैसे उत्पादों, जिनमें भारत पहले से ही अमेरिकी आयात का 24.7% हिस्सा रखता है, के लिए यह एक बड़ा बूस्टर साबित होगा। इसी तरह, चाय, कॉफी और मसालों जैसे सेक्टर, जो फिलहाल अमेरिका को होने वाले भारत के कुल आयात का करीब 3% हिस्सा हैं, अमेरिकी बाज़ार में अपनी पकड़ और मज़बूत कर पाएंगे। पहले अमेरिकी टैरिफ से पिछड़ रहा मछली (Fishery) सेक्टर भी अब बेहतर निर्यात संभावनाओं से उबरने की उम्मीद है।

वैश्विक स्तर पर देखें तो अमेरिका का कृषि आयात बाज़ार काफी बड़ा है, जो भारत के निर्यात भागीदारों से $81 बिलियन तक के चयनित उत्पादों का आयात करता है। हालांकि, इन चुनिंदा कैटेगरी में भारत की वर्तमान हिस्सेदारी करीब 3.5% है, जो बताता है कि अभी विकास की काफी गुंजाइश है। अमेरिका के प्रमुख कृषि आयात स्रोतों में मेक्सिको, कनाडा और यूरोपीय संघ शामिल हैं, जो बाज़ार पर हावी हैं। ब्राज़ील भी, खासकर सोयाबीन के क्षेत्र में, एक मज़बूत प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है। अमेरिका खुद एक बड़े कृषि व्यापार घाटे से जूझ रहा है, जो फाइनेंशियल ईयर 2025 में लगभग $49.5 बिलियन तक पहुँच गया था, इससे आयातित उत्पादों की मज़बूत मांग का पता चलता है।

ऐतिहासिक रूप से देखें तो, अमेरिका के साथ भारत का कृषि व्यापार सरप्लस एक मज़बूत पक्ष रहा है, लेकिन टैरिफ विवादों ने द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में उतार-चढ़ाव पैदा किया है। नया समझौता, जिसमें अमेरिकी रेसिप्रोकल टैरिफ को पहले 50% से ज़्यादा से घटाकर 18% किया गया है, व्यापारिक तनाव में एक महत्वपूर्ण कमी का संकेत देता है। यह व्यापार को संतुलित करने और बाज़ार तक पहुँच बढ़ाने के व्यापक ढांचे का हिस्सा है।

चुनौतियां: क्या हैं बाधाएं?

टैरिफ में कमी की उम्मीदों के बावजूद, कई अहम चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। जबकि अमेरिका ने $1.36 बिलियन के भारतीय कृषि निर्यात पर ज़ीरो अतिरिक्त ड्यूटी के लिए सहमति जताई है, अमेरिकी कृषि आयात का एक बड़ा हिस्सा अभी भी स्थापित वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करता है। अमेरिका का कृषि आयात बाज़ार विविध है, जहाँ मेक्सिको और कनाडा जैसे देशों का दबदबा है, और ब्राज़ील सोयाबीन जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा, अमेरिकी कृषि व्यापार घाटा बढ़ने का अनुमान है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आयात बढ़ने के बावजूद, बाज़ार की समग्र गतिशीलता सभी आपूर्तिकर्ताओं के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बनी रहेगी।

टैरिफ के अलावा, नॉन-टैरिफ बैरियर्स (NTBs) एक गंभीर बाधा बने हुए हैं। भारत ने अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों को प्रभावित करने वाले लंबे समय से चले आ रहे NTBs को दूर करने का वादा किया है, लेकिन इन उपायों का व्यावहारिक कार्यान्वयन और प्रभावशीलता अभी देखी जानी बाकी है। दूसरी ओर, भारत ने अपने संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों, जैसे अनाज, दालें, पोल्ट्री और डेयरी को अमेरिकी आयात पर महत्वपूर्ण टैरिफ रियायतों से सुरक्षित रखा है, जिससे बाज़ार खोलने का दायरा सीमित हो गया है। भारतीय किसान समूहों ने भी चिंता जताई है, जिससे समझौते के खिलाफ घरेलू विरोध और विरोध प्रदर्शन का खतरा बढ़ गया है, जो किसानों की आजीविका और बाज़ार संरक्षण से जुड़ी संवेदनशीलता को दर्शाता है।

भविष्य की राह: प्रतिस्पर्धा के बीच विकास की उम्मीद

इस समझौते से न केवल भारत का मौजूदा कृषि व्यापार सरप्लस बना रहेगा, बल्कि इसके और बड़े पैमाने पर बढ़ने की उम्मीद है। कुछ अनुमानों के अनुसार, समझौते के बाद सालाना सरप्लस $90 बिलियन से अधिक हो सकता है। टैरिफ में कमी को भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाज़ार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने का एक सुनहरा अवसर माना जा रहा है। SBI रिपोर्ट का अनुमान है कि भारतीय निर्यातक अमेरिका को शीर्ष वस्तुओं के अपने निर्यात में सालाना लगभग $97 बिलियन की वृद्धि कर सकते हैं, जिससे कुल निर्यात $100 बिलियन के पार जा सकता है। इस विस्तार से भारत के GDP में सकारात्मक योगदान की उम्मीद है, जिसका अनुमानित प्रभाव 1.1% है। व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते का लक्ष्य 2030 तक कुल द्विपक्षीय व्यापार को $500 बिलियन तक पहुंचाना है, जिसमें कृषि इस महत्वाकांक्षा का एक केंद्रीय हिस्सा है।

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