ITC Foods के CEO, हेमंत मलिक ने चेतावनी दी है कि El Niño के कारण आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों की सप्लाई (supply) टाइट हो सकती है और ग्रामीण इलाकों में ग्राहकों की मांग (demand) पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, मौजूदा मांग अभी मजबूत बनी हुई है, लेकिन निवेशकों को प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स में महंगाई और मुनाफे (profit margins) पर इसके असर पर नजर रखनी चाहिए।
El Niño का मंडराता खतरा: क्या अनाज की सप्लाई होगी कम?
भारत का कृषि क्षेत्र इस समय अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। El Niño के कारण मौसम में संभावित बदलावों का खतरा मंडरा रहा है, जिससे आने वाले समय में अनाज उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ITC Foods के डिविजनल CEO, हेमंत मलिक ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही इस समय खाने-पीने की चीजों की सप्लाई (food supply) स्थिर है, लेकिन मॉनसून के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव होने पर साल के अंत तक सप्लाई की किल्लत पैदा हो सकती है। इस संभावित सप्लाई में कमी का सीधा असर न केवल कच्चे माल की उपलब्धता पर पड़ेगा, बल्कि उत्पादन लागत (cost of production) भी बढ़ेगी, जिसका सीधा असर कीमतों पर दिख सकता है।
ग्रामीण मांग और कंपनी के मुनाफे पर असर
ग्रामीण भारत, ITC जैसी FMCG कंपनियों के लिए खपत का एक बड़ा जरिया है। जब कृषि उत्पादन पर मौसम की मार पड़ती है, तो ग्रामीण आय (rural income) घट जाती है, जिसका सीधा असर प्रोसेस्ड फूड आइटम्स की डिमांड पर पड़ता है। मलिक ने यह भी बताया कि मौजूदा मांग (demand) के आंकड़े अभी भी ठीक हैं और कंपनी ने साल की शुरुआत में देखी गई सप्लाई की तंगी को सफलतापूर्वक संभाला है। हालांकि, लगातार बढ़ती कीमतों को काबू में रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यदि सप्लाई से जुड़ी समस्याओं के कारण कृषि कमोडिटीज (agricultural commodities) के दाम ऊंचे बने रहते हैं, तो ग्राहकों पर बोझ डाले बिना अपने प्रॉफिट मार्जिन को बनाए रखना इंडस्ट्री के लिए मुश्किल हो जाएगा।
ग्लोबल ब्रांड्स की ओर बढ़ता ITC
घरेलू चिंताओं से परे, ITC का नेतृत्व इस बात पर जोर दे रहा है कि भारत को केवल थोक कमोडिटी एक्सपोर्टर (bulk commodity exporter) बनकर नहीं रहना चाहिए। कंपनी का लक्ष्य भारत को प्रोसेस्ड फूड ब्रांड्स के लिए एक ग्लोबल पावरहाउस (global powerhouse) के रूप में स्थापित करना है। इस रणनीति का मकसद कम मार्जिन वाले और भारी मात्रा में होने वाले कमोडिटी ट्रेड पर निर्भर रहने के बजाय, वैल्यू-एडेड (value-added) सेगमेंट्स में बड़ा हिस्सा हासिल करना है। सरकार द्वारा विभिन्न फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (Free Trade Agreements) के जरिए बाजार पहुंच बढ़ाने के प्रयास इस महत्वाकांक्षा को पंख लगा सकते हैं, बशर्ते भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी ब्रांड पहचान बना सकें।
निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
फूड और एग्री-बिजनेस स्पेस पर नजर रखने वाले निवेशकों को आने वाले समय में कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले, मॉनसून की प्रगति और उसके बाद गेहूं, चीनी और खाद्य तेलों जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की पैदावार पर इसका असर देखना होगा। इसके अलावा, आगामी तिमाही नतीजों (quarterly results) में ग्रामीण इलाकों में वॉल्यूम ग्रोथ (volume growth) और लागत अनुकूलन (cost optimization) के जरिए महंगाई के दबाव को संभालने की कंपनी की क्षमता महत्वपूर्ण संकेत देगी। ब्रांडेड एक्सपोर्ट्स की ओर बढ़ने की यह रणनीति कितनी सफल होती है, यह भी कंपनी की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थापित ग्लोबल प्लेयर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
