सरकार ने Bharat Soil Health Policy का ऐलान किया है, जिसके तहत **1 लाख** ग्रामीण आंत्रप्रेन्योर्स तैयार किए जाएंगे। इसका मकसद केमिकल फर्टिलाइजर के बेतहाशा इस्तेमाल को कम करना और ऑर्गनो-मिनरल प्रोडक्ट्स को बढ़ावा देना है।
भारत सरकार ने खेती में खाद के इस्तेमाल को आधुनिक बनाने के लिए 'भारत सॉइल हेल्थ पॉलिसी' का खाका पेश किया है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) इस योजना के तहत 1 लाख ग्रामीण आंत्रप्रेन्योर्स को ट्रेनिंग देगा। ये आंत्रप्रेन्योर्स किसानों को खाद के सही और संतुलित इस्तेमाल के लिए गाइड करेंगे ताकि खेती में केमिकल खाद की निर्भरता कम हो सके।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है संकेत?\nनिवेशकों को इस बदलाव पर बारीक नजर रखनी होगी। अब तक फर्टिलाइजर सेक्टर काफी हद तक सरकारी सब्सिडी और भारी मात्रा में खाद की बिक्री (Volume-based model) पर टिका रहा है। लेकिन सरकार अब 'एफिशिएंसी-इंसेंटिवाइज्ड' सिस्टम की तरफ बढ़ रही है। योजना में ग्लुकोनाइट जैसे स्वदेशी मिनरल और 'गोबरधन स्कीम' के तहत बायो-फर्टिलाइजर्स पर जोर दिया जा रहा है। जो कंपनियां अपनी प्रोडक्ट रेंज में ऑर्गनो-मिनरल विकल्पों को तेजी से शामिल करेंगी, वे आने वाले समय में मार्केट में बढ़त बना सकती हैं।\n\n### पुराने सबक और नई सतर्कता\nसरकार ने माना है कि 2021 में नैनो-फर्टिलाइजर्स के रोलआउट के दौरान कम्युनिकेशन गैप रहा था। इसे सुधारने के लिए ICAR ने 15 अलग-अलग लोकेशन्स पर रिसर्च शुरू की है ताकि नई टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के पुख्ता प्रमाण मिल सकें। \n\nवर्तमान में 100 से ज्यादा जिलों में केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल जरूरत से दोगुना है। अगर यह पॉलिसी सफल होती है, तो यह फर्टिलाइजर कंपनियों के रेवेन्यू स्ट्रक्चर को बदल सकती है। निवेशकों को अब Coromandel International, Chambal Fertilisers, RCF और NFL जैसी कंपनियों की आरएंडडी (R&D) रणनीति पर नजर रखनी चाहिए कि वे इस नए रेगुलेटरी बदलाव के साथ खुद को कैसे ढालती हैं।
