भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) के खिलाफ एक स्वदेशी वैक्सीन तैयार कर ली है। यह घातक बीमारी सूअर पालन उद्योग के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई थी, और इस नई वैक्सीन से किसानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
ASF का खौफ खत्म करने की तैयारी
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) के खिलाफ एक बड़ी सफलता हासिल की है। ICAR की एक संस्था, भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज (NIHSAD) ने स्वदेशी वैक्सीन विकसित कर ली है। यह वैक्सीन एक कमजोर (attenuated) वायरस स्ट्रेन का उपयोग करती है, जो सूअरों को इस जानलेवा बीमारी से बचाने में मदद करेगी।
अर्थव्यवस्था पर ASF का भारी बोझ
आपको बता दें कि ASF, जो 2020 में पहली बार भारत में पाई गई थी, सूअर पालन उद्योग के लिए एक विनाशकारी साबित हुई है। इस बीमारी में मरने वाले सूअरों की दर 100% तक पहुंच जाती है। इसके कारण, अब तक सिर्फ क्वारंटाइन, बायो-सिक्योरिटी उपाय और संक्रमित जानवरों को मारना (culling) जैसे तरीके ही अपनाए जा रहे थे। लेकिन इन तरीकों से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। खास तौर पर पूर्वोत्तर राज्यों में, असम में 2020-21 के दौरान ₹276 करोड़ का नुकसान हुआ, जबकि मिजोरम में 2025 तक ₹982 करोड़ का अनुमानित नुकसान हुआ है। कुल मिलाकर, यह बीमारी अब तक ₹1,200 करोड़ से ज़्यादा का नुकसान पहुंचा चुकी है।
साइंटिफिक टेस्टिंग और अगले कदम
इस वैक्सीन की सुरक्षा और असर को सुनिश्चित करने के लिए, ICAR ने पशुपालन और डेयरी विभाग के साथ मिलकर कई लेबोरेटरी टेस्ट और फील्ड ट्रायल किए हैं। इसमें इम्युनोजेनेसिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता), सुरक्षा और जेनेटिक स्टेबिलिटी की जांच की गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वायरस किसी भी स्थिति में खतरनाक न हो।
इस वैक्सीन के आने से बड़े पैमाने पर सूअरों को मारने की ज़रूरत कम हो जाएगी। यह कदम सूअर पालन के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाएगा, क्योंकि अब 'रिएक्टिव' यानी बीमारी फैलने पर कार्रवाई करने की बजाय 'प्रो-एक्टिव' यानी बचाव पर जोर दिया जाएगा। अब देखना यह है कि यह वैक्सीन कब तक बड़े पैमाने पर तैयार होती है, छोटे किसानों तक कैसे पहुंचती है, और इसे बाजार में उतारने की पूरी प्रक्रिया कब पूरी होती है। अगर यह सफल होती है, तो सूअर पालन उद्योग में स्थिरता आएगी और हजारों किसानों की आजीविका सुरक्षित होगी।
