पश्चिम बंगाल में नदी वाली Hilsa मछली की मांग पूरी करना मुश्किल हो गया है। पिछले दो दशकों में इसका उत्पादन बहुत कम हो गया है। इस कमी को पूरा करने के लिए व्यापारी अब समुद्र, म्यांमार और गुजरात से मछली मंगा रहे हैं, जिससे कीमतों में बड़ा अंतर और क्वालिटी को लेकर चिंता बढ़ गई है। शोधकर्ता सप्लाई की कमी को दूर करने के लिए एक्वाकल्चर (aquaculture) के तरीके आजमा रहे हैं।
Detailed Coverage
Hilsa उत्पादन में भारी गिरावट
बंगाल की संस्कृति का अहम हिस्सा, Hilsa मछली इन दिनों सप्लाई के संकट से जूझ रही है। पारंपरिक नदी स्रोतों से मिलने वाली Hilsa की मात्रा लगातार घट रही है। सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CIFRI) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2001 में जहां देश में करीब 80,000 टन Hilsa का उत्पादन होता था, वहीं 2016 तक यह घटकर 40,000 टन रह गया। इस भारी गिरावट ने पश्चिम बंगाल में Hilsa के पहुंचने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है।
सप्लाई कम होने के पीछे के कारण
विशेषज्ञ इस कमी के पीछे कई पर्यावरणीय और इंसानी वजहें बता रहे हैं। क्लाइमेट चेंज (Climate Change) की वजह से बारिश के पैटर्न में बदलाव आया है, जिसने मछली के प्राकृतिक प्रवास और प्रजनन चक्र को बाधित किया है। इसके अलावा, बच्चे अंडों से निकलकर बड़े होने से पहले हीjuvenile fish को पकड़ना और अत्यधिक मछली पकड़ना (overfishing) भी इनकी आबादी पर भारी पड़ा है। वहीं, पड़ोसी देश बांग्लादेश ने सख्त मौसमी प्रतिबंधों, विशेष Hilsa क्षेत्रों की सुरक्षा और मछली पकड़ने वाली जाल की जाली के आकार को नियंत्रित करके बेहतर उत्पादन बनाए रखा है। इसी वजह से बांग्लादेश से पकड़ी गई Hilsa अक्सर 1 किलोग्राम से ज़्यादा वज़नी होती है, जबकि भारत की नदियों से पकड़ी गई Hilsa आमतौर पर 400-500 ग्राम की ही होती है।
बाज़ार का गणित और ग्राहकों की जेब
इस कमी ने बाज़ार में एक नई व्यवस्था बना दी है। नदी से पकड़ी गई Hilsa, जो कि सीमित सप्लाई और भावनात्मक मांग के कारण एक प्रीमियम प्रोडक्ट बन गई है, उसकी कीमत ₹1,500 से ₹1,800 प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है। इस अंतर को पाटने के लिए, बाज़ार अब गुजरात तट से आने वाली समुद्री Hilsa से भर गया है, जो काफी सस्ती, ₹400 से ₹600 प्रति किलोग्राम में मिल रही है। इसके साथ ही म्यांमार से भी इम्पोर्ट (import) किया जा रहा है। इस बदलाव ने उपभोक्ताओं के बीच नदी वाली Hilsa के मुकाबले समुद्री किस्मों के स्वाद और गुणवत्ता को लेकर एक बहस छेड़ दी है। रेस्टोरेंट्स और थोक विक्रेताओं ने भी अपने बिज़नेस मॉडल बदले हैं, कई थोक विक्रेता अब एडवांस पेमेंट पर सप्लाई ले रहे हैं, और रेस्टोरेंट लागत कम करने और बर्बादी रोकने के लिए ‘nose-to-tail’ कुकिंग जैसे तरीकों को अपना रहे हैं।
एक्वाकल्चर (Aquaculture) की उम्मीद
CIFRI के वैज्ञानिक, Hilsa को मीठे पानी के तालाबों में पालने की कोशिश कर रहे हैं ताकि एक स्थायी समाधान मिल सके। भले ही बंद जगह (captivity) में ब्रीडिंग (breeding) के शुरुआती प्रयासों में कुछ सफलता मिली है, लेकिन इन मछलियों को लगातार पालना और यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि इनका स्वाद जंगली Hilsa जैसा हो, जो इसे सांस्कृतिक पहचान दिलाता है। फिशरीज सेक्टर में निवेशक और स्टेकहोल्डर्स (stakeholders) के लिए, इन एक्वाकल्चर प्रोजेक्ट्स की व्यावसायिक व्यवहार्यता (commercial viability) और क्या वे प्राकृतिक नदी स्टॉक पर पड़ रहे दबाव को सफलतापूर्वक कम कर पाएंगे, यह देखना अहम होगा। तालाबों में जीवित रहने की दर (survival rates) और फार्म वाली किस्मों को बाज़ार की स्वीकृति पर भविष्य के अपडेट, क्षेत्रीय समुद्री भोजन उद्योग पर लंबे समय तक पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
