खाड़ी में टेंशन का असर: इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स ने बदले 'FOB' नियम, जानें क्यों?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
खाड़ी में टेंशन का असर: इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स ने बदले 'FOB' नियम, जानें क्यों?
Overview

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स (Indian Rice Exporters) के लिए एक अहम सलाह जारी की गई है। खाड़ी देशों में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए, उन्हें CIF (कॉस्ट, इंश्योरेंस और फ्रेट) की जगह FOB (फ्री ऑन बोर्ड) शर्तों पर सौदे करने की सलाह दी गई है। इस रणनीतिक बदलाव का मुख्य मकसद बढ़ती फ्यूल, फ्रेट और इंश्योरेंस जैसी लागतों के जोखिम को कम करना है।

जोखिमों से बचने के लिए बड़ा कदम

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने जोखिम प्रबंधन के तरीके में बड़ा बदलाव करने की सलाह दी है। इसके तहत, निर्यातकों को अब सीधे खरीदारों पर शिपिंग से जुड़े जोखिमों का बोझ डालने के लिए CIF (कॉस्ट, इंश्योरेंस और फ्रेट) की जगह FOB (फ्री ऑन बोर्ड) शर्तों पर काम करने को कहा गया है। इस कदम से भारतीय सप्लायर्स को पर्शियन गल्फ (Persian Gulf) में बिगड़ते सुरक्षा हालात के कारण अचानक बढ़ी लागतों, खासकर फ्यूल सरचार्ज और इंश्योरेंस प्रीमियम में उछाल से बचाया जा सकेगा। दरअसल, वर्तमान माहौल में CIF मॉडल, जहां डिलीवरी तक सभी लागतों का प्रबंधन निर्यातक करता है, अचानक कीमतों में बढ़ोत्तरी और शिपिंग में रुकावटों के कारण अव्यवहारिक साबित हो रहा था। इसलिए, यह बदलाव सिर्फ मुनाफे को बचाने के लिए नहीं, बल्कि निर्यात सौदों की व्यवहार्यता (viability) बनाए रखने के लिए उठाया गया है।

शिपिंग जोखिमों का बढ़ता ग्राफ

मध्य पूर्व, खासकर ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास की भू-राजनीतिक अस्थिरता (geopolitical instability) समुद्री व्यापार की लागतों को सीधा प्रभावित कर रही है। IREF ने चेतावनी दी है कि क्षेत्र में बिगड़ते हालात से बंकर फ्यूल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिससे कंटेनर और बल्क फ्रेट रेट्स में अचानक बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही, इन खतरनाक जलमार्गों से गुजरने वाले जहाजों के लिए इंश्योरेंस प्रीमियम में भी भारी वृद्धि की आशंका है। लागतों के इस संगम से निश्चित मूल्य वाले CIF सौदे भारतीय निर्यातकों के लिए आर्थिक रूप से नुकसानदायक हो सकते हैं।

भारत के चावल निर्यात पर असर

आंकड़ों के मुताबिक, अफ्रीका और मध्य पूर्व को भारत का कुल चावल निर्यात, देश के समग्र निर्यात का लगभग आधा है। वहीं, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच अकेले मध्य पूर्व में 39 लाख टन चावल का निर्यात हुआ, जबकि अफ्रीका में 71.6 लाख टन निर्यात किया गया। प्रीमियम बासमती चावल के मामले में यह जोखिम और भी केंद्रित है, क्योंकि सऊदी अरब, ईरान, इराक, यूएई और यमन जैसे शीर्ष पांच खरीदार इसी क्षेत्र में हैं और वे भारत के बासमती निर्यात का लगभग 50% हिस्सा खरीदते हैं। हाल ही में बासमती के थोक मूल्यों में एक महीने की तुलना में 10-15% की वृद्धि हुई है, और ईरान जैसे महत्वपूर्ण बाजार को देखते हुए, फेडरेशन ने आने वाले दिनों में बासमती की कीमतों में 'बढ़ी हुई अस्थिरता' की चेतावनी दी है।

वैश्विक व्यापार और प्रतिस्पर्धा

ऐसी ही भू-राजनीतिक दबावों के जवाब में, वियतनाम और थाईलैंड जैसे अन्य प्रमुख चावल निर्यातक देशों ने ऐतिहासिक रूप से FOB या इसी तरह की व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी है। भारत के चावल निर्यातक, जो पहले से ही कम मार्जिन पर काम कर रहे हैं, उन्हें बढ़ती लागतों के कारण अधिक प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले नुकसान हो सकता है। FAO राइस प्राइस इंडेक्स (FAO Rice Price Index) के अनुसार, वैश्विक चावल कमोडिटी की कीमतें मजबूत मांग के कारण ऊंची बनी हुई हैं, लेकिन मध्य पूर्व की वर्तमान अस्थिरता भारतीय निर्यात के लिए एक विशेष 'रिस्क प्रीमियम' जोड़ रही है। भारत-मध्य पूर्व मार्गों पर फ्रेट दरों में पहले से ही मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में लगातार रुकावट आती है, तो इसमें बड़ी वृद्धि की आशंका है। कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि मध्य पूर्व के देश भारत के कुल चावल निर्यात का 70% से अधिक हिस्सा खरीदते हैं, जिससे इस व्यापार मार्ग का महत्व और बढ़ जाता है।

मांग में गिरावट का खतरा

FOB शर्तों पर जाने से जहां भारतीय निर्यातकों को लागत वृद्धि से सुरक्षा मिलेगी, वहीं मांग में भारी गिरावट (demand destruction) का एक बड़ा जोखिम भी है। मध्य पूर्व के खरीदार, जो खुद आर्थिक दबाव में हो सकते हैं, शिपिंग और बीमा के पूरे जोखिम को उठाने से हिचकिचा सकते हैं। वे वैकल्पिक, अधिक स्थिर आपूर्ति स्रोतों की तलाश कर सकते हैं। यह खासकर बासमती जैसे प्रीमियम किस्मों के लिए चिंता का विषय है, जिनकी कीमत के प्रति संवेदनशीलता अधिक है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि यदि संघर्ष मध्य पूर्व के और देशों में फैला, तो भारत के घरेलू बाजार में इन चावल किस्मों का भारी सरप्लस (surplus) हो सकता है। इससे स्थानीय कीमतें गिर सकती हैं, जो किसानों और मिलरों के लिए एक और आर्थिक झटका साबित होगा।

भविष्य का परिदृश्य

उद्योग के जानकारों को चावल निर्यात बाजार में, खासकर मध्य पूर्व के साथ व्यापार को लेकर, लगातार बढ़ती अस्थिरता की उम्मीद है। IREF की सक्रिय सलाह यह संकेत देती है कि क्षेत्रीय अस्थिरता लंबे समय तक बनी रह सकती है, जिससे शिपिंग और बीमा लागतें ऊंची बनी रहेंगी। फेडरेशन की स्थिति पर लगातार नजर रखने की प्रतिबद्धता से पता चलता है कि निर्यातकों को व्यापार रणनीतियों और मूल्य निर्धारण तंत्र में और समायोजन के लिए तैयार रहना चाहिए।

कुल मिलाकर, वैश्विक खाद्य मांग मजबूत रहने के बावजूद, भू-राजनीतिक बाधाएं सप्लाई-साइड झटकों और परिणामस्वरूप मूल्य दबावों के कारण सप्लाई को प्रभावित कर सकती हैं।

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