भारत में एथेनॉल उत्पादन में बड़ा बदलाव आया है। अब कुल उत्पादन का करीब **70%** हिस्सा ग्रेन-आधारित (अनाज से बना) एथेनॉल का है, जिसने शुगर-आधारित एथेनॉल को पीछे छोड़ दिया है।
भारत में एथेनॉल उत्पादन का बदलता परिदृश्य
इंडियन एथेनॉल सेक्टर में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अब कुल उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा ग्रेन-आधारित एथेनॉल से आ रहा है। यह पिछले सालों के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है, जब उत्पादन ग्रेन और शुगर-आधारित फीडस्टॉक के बीच लगभग बराबर बंटा हुआ था। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस बदलाव की मुख्य वजह शुगर-आधारित एथेनॉल पर आर्थिक दबाव है। शुगर फीडस्टॉक की बढ़ती लागत के मुकाबले, उत्पादित एथेनॉल की कीमत में उतनी बढ़ोतरी नहीं हुई है।
क्षमता से ज़्यादा उत्पादन और निवेश पर रोक
ब्लेंडिंग प्रोग्राम (Blending Programs) में बढ़ोतरी के बावजूद, यह इंडस्ट्री फिलहाल क्षमता से ज़्यादा उत्पादन (Capacity Overhang) की समस्या से जूझ रही है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, ग्रेन और शुगर-आधारित दोनों प्लांट्स को मिलाकर एथेनॉल उत्पादन की कुल क्षमता लगभग 200 करोड़ लीटर तक पहुँच चुकी है। हालांकि, वर्तमान मांग केवल 110 से 120 करोड़ लीटर के बीच है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) जैसे इंडस्ट्री लीडर्स का कहना है कि इस समय अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। अब शुगर मिल्स का ध्यान नई बड़ी परियोजनाओं में पैसा लगाने के बजाय, मौजूदा सुविधाओं का सबसे अच्छा इस्तेमाल करने पर शिफ्ट हो रहा है।
शुगर मिल्स में ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी
कई शुगर कंपनियाँ पहले भी सीजनल सप्लाई चेन को मैनेज करने के लिए डुअल-फीड डिस्टिलरी (Dual-Feed Distilleries) में निवेश कर चुकी हैं। ये प्लांट्स कंपनियों को 4 से 6 महीने के शुगर क्रशिंग सीजन के दौरान शुगर-आधारित एथेनॉल बनाने और ऑफ-सीजन में ग्रेन-आधारित एथेनॉल पर स्विच करने की सुविधा देते हैं। हालाँकि फीडस्टॉक की उपलब्धता को लेकर यह ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी एक सुरक्षा कवच प्रदान करती है, लेकिन मौजूदा कॉस्ट डायनामिक्स (Cost Dynamics) कंपनियों को अपनी डिस्टिलरी का विस्तार करने से रोक रही है। निवेशकों को यह ध्यान देना चाहिए कि फीडस्टॉक के बीच स्विच करने की क्षमता इस सेक्टर में स्थापित प्लेयर्स के लिए एक बड़ा अंतर पैदा करती है।
लंबी अवधि की मांग का अनुमान
आगे चलकर, सरकार द्वारा एथेनॉल ब्लेंडिंग लेवल्स को बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (Flex-Fuel Vehicles) की शुरुआत से मांग में धीरे-धीरे बढ़ोतरी की उम्मीद है। जब Maruti Suzuki जैसी ऑटोमोबाइल कंपनियाँ E85 फ्यूल के साथ कम्पेटिबल (Compatible) मॉडल लॉन्च करेंगी, तो इंडस्ट्री को उच्च एथेनॉल ब्लेंड्स की ओर बढ़ने की उम्मीद है। एथेनॉल उत्पादन सेक्टर का भविष्य काफी हद तक फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स के अडॉप्शन (Adoption) की गति और E100 फ्यूल की ओर संभावित बदलाव पर निर्भर करेगा, जो पूरे देश में क्षमता के बेहतर उपयोग के लिए ज़रूरी होगा। भविष्य में निवेशकों को शुगर बनाम ग्रेन फीडस्टॉक की कीमतों के ट्रेंड और ऑटोमोटिव सेक्टर द्वारा उच्च-ब्लेंड कम्पेटिबल व्हीकल्स को अपनाने की रफ़्तार पर नज़र रखनी होगी।
