केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का लाभ दिलाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरुआत की है। इस पहल का मकसद कृषि उत्पादों की क्वालिटी सुधारना और उन्हें ड्यूटी-फ्री ग्लोबल मार्केट तक पहुंचाना है ताकि भारत सरप्लस मैनेजमेंट से आगे बढ़कर एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड ग्रोथ की ओर बढ़ सके।
सरकार ने अपने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का लाभ देश के एग्रीकल्चर सेक्टर तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक जागरूकता कार्यक्रम शुरू किया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान इस पहल का ऐलान किया। इसका मुख्य उद्देश्य उस सूचना की कमी को दूर करना है, जिसके कारण किसान और एक्सपोर्टर्स उन ड्यूटी-फ्री लाभों का फायदा नहीं उठा पाते जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूद हैं।
ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा
हालांकि भारत ने कई देशों के साथ ट्रेड समझौते किए हैं, लेकिन कई प्रोड्यूसर्स इन समझौतों से मिलने वाली सुविधाओं से अनजान हैं। सरकार चाहती है कि भारतीय कृषि उत्पाद उन देशों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर सकें जिन्होंने भारतीय सामानों पर इंपोर्ट ड्यूटी हटा दी है।
क्वालिटी है सबसे बड़ी चुनौती
इस अभियान का एक बड़ा हिस्सा 'क्वालिटी कम्प्लायंस' पर केंद्रित है। एग्रीकल्चरल एक्सपोर्ट में केवल डिमांड पहचानना ही काफी नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के सैनेटरी और फाइटोसैनेटरी स्टैंडर्ड्स को पूरा करना भी अनिवार्य है। कई बार क्वालिटी मानकों या अवशेषों (residue levels) की चिंताओं के कारण भारतीय खेप रिजेक्ट हो जाती है। अब सरकार पार्टनर देशों की क्वालिटी जरूरतों का सटीक डेटा उपलब्ध कराएगी।
बदलती रणनीति
यह कदम सरकार की लॉन्ग-टर्म पॉलिसी का हिस्सा है। 2014 से अब तक कुल 9 बड़े ट्रेड एग्रीमेंट्स हुए हैं। इनमें सबसे ताजा समझौता अप्रैल 2026 में न्यूजीलैंड के साथ हुआ है। सरकार का स्पष्ट विजन है कि भारत को केवल घरेलू सरप्लस के बोझ को मैनेज नहीं करना है, बल्कि हाई-वैल्यू एक्सपोर्ट की तरफ बढ़ना है।
निवेशकों के लिए संकेत
मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए यह देखना जरूरी होगा कि यह पॉलिसी जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है। एक्सपोर्ट में सफलता केवल सरकारी नीतियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसके लिए कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स में दक्षता की भी जरूरत है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कृषि निर्यात के आंकड़ों और राज्य-स्तरीय कार्यान्वयन पर नजर रखनी चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि क्या यह पहल एक्सपोर्टर्स के मार्जिन को वास्तव में सुधार रही है या नहीं।
