भारत का फर्टिलाइजर सेक्टर नई सरकारी पॉलिसी NIPU-2026 के तहत एक बड़े विस्तार के लिए तैयार है। आने वाले समय में इंडस्ट्री में ₹80,000 से ₹90,000 करोड़ का निवेश होने की उम्मीद है, जिसका मुख्य लक्ष्य यूरिया का उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है। हालांकि, नई नीति के कारण नए प्रोजेक्ट्स के लिए प्रॉफिट मार्जिन और रिटर्न लिमिट पर असर पड़ सकता है, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर रहेगी।
इंडस्ट्री में ₹90,000 करोड़ का निवेश
भारत का फर्टिलाइजर (खाद) उद्योग क्षमता विस्तार के एक बड़े दौर में प्रवेश कर रहा है। आने वाले महीनों में इंडस्ट्री में ₹80,000 करोड़ से ₹90,000 करोड़ तक का भारी निवेश होने की उम्मीद है। इस विस्तार को सरकार की नई 'न्यू इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया-2026' (NIPU-2026) से बढ़ावा मिल रहा है। इस पहल का सबसे बड़ा मकसद घरेलू यूरिया उत्पादन को बढ़ाना और आयात पर देश की भारी निर्भरता को कम करना है। आपको बता दें कि 2025-26 में देश की लगभग 27% यूरिया की मांग आयात से पूरी हुई थी।
नए प्रोजेक्ट्स की इकोनॉमिक्स पर असर
NIPU-2026 पॉलिसी का लक्ष्य 8 से 9 नए गैस-आधारित प्लांट्स के जरिए सालाना 10 मिलियन टन क्षमता बढ़ाना है। लेकिन, रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, यह नीति कंपनियों के लिए पहले की NIP-2012 पॉलिसी की तुलना में थोड़ी सख्त है। नई नीति के तहत, नए प्रोजेक्ट्स के लिए इक्विटी पर मिलने वाला अधिकतम रिटर्न 12% से 16% तक सीमित कर दिया गया है, जो कि पुरानी पॉलिसी में 12% से 20% था।
इस बदलाव से कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर पड़ सकता है। ICRA का अनुमान है कि एक सामान्य 1.27 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता वाले यूरिया प्लांट के लिए, EBITDA पहले के मुकाबले ₹250-280 करोड़ तक कम हो सकता है। ऐसे में, कंपनियों को कैपिटल खर्च (Capital Spending) को कंट्रोल में रखने और 95% से ऊपर कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बनाए रखने पर खास ध्यान देना होगा ताकि प्रोजेक्ट्स पर अच्छा रिटर्न मिल सके।
इंपोर्टेड गैस पर निर्भरता और लागत का खेल
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि फर्टिलाइजर इंडस्ट्री यूरिया बनाने के लिए मुख्य रूप से नेचुरल गैस पर निर्भर है, और इसका 85% हिस्सा इंपोर्टेड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) से आता है। अप्रैल 2026 में फर्टिलाइजर पूल गैस की कीमत बढ़कर लगभग $19 प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट तक पहुंच गई है, जो पहले $13 थी। इससे लागत प्रबंधन और भी मुश्किल हो गया है।
वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के इस जोखिम को देखते हुए, जो कंपनियां अपनी गैस सप्लाई को डाइवर्सिफाई (Diversify) करने में कामयाब होंगी, उन्हें फायदा मिल सकता है। इन नए यूरिया प्रोजेक्ट्स की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां इनपुट लागतों को कैसे मैनेज करती हैं, खासकर जब नए प्लांट्स लगाना अपने आप में एक बड़ी पूंजी वाला काम है।
प्रोड्यूसर्स के अलावा इन सेक्टर्स को भी मिलेगा फायदा
आने वाले समय में इंडस्ट्री के विस्तार से जुड़े हुए दूसरे सेक्टर्स को भी मौके मिलने की उम्मीद है। अगले 3.5 से 4 सालों में 8 से 9 नए प्लांट्स के कंस्ट्रक्शन के लिए इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) कॉन्ट्रैक्टर्स की बड़ी मांग होगी। इसके अलावा, नेचुरल गैस की बढ़ी हुई मांग से गैस ट्रांसमिशन कंपनियों, LNG टर्मिनल ऑपरेटर्स और स्पेशलाइज्ड प्रोसेस इक्विपमेंट (जैसे हाई-प्रेशर वेसल्स, हीट एक्सचेंजर्स और अमोनिया कन्वर्टर्स) बनाने वाली कंपनियों को भी फायदा हो सकता है।
निवेशकों को आने वाले वर्षों में इन प्रोजेक्ट्स के वास्तविक कंप्लीशन पर नजर रखनी चाहिए। सरकार की पॉलिसी ग्रोथ का एक रोडमैप तो देती है, लेकिन भाग लेने वाली कंपनियों की वित्तीय सेहत इस बात पर निर्भर करेगी कि वे 3.5-4 साल की तय समय-सीमा में प्रोजेक्ट्स को कैसे पूरा करती हैं और वैश्विक गैस कीमतों व करेंसी के उतार-चढ़ाव जैसे जोखिमों से कैसे निपटती हैं।
