El Nino का कहर जारी: भारत में मॉनसून की कमी **13%** तक पहुंची, खरीफ फसलों पर खतरा

AGRICULTURE
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
El Nino का कहर जारी: भारत में मॉनसून की कमी **13%** तक पहुंची, खरीफ फसलों पर खतरा

भारत में इस साल मॉनसून की बारिश में **13%** की बड़ी कमी दर्ज की गई है। अल नीनो (El Nino) के बढ़ते असर के कारण मौसम के पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। सितंबर के मध्य तक मॉनसून के वापस जाने की उम्मीद है, और बाज़ार खाद्य महंगाई (Food Inflation) और ग्रामीण खपत (Rural Consumption) पर इसके असर पर पैनी नज़र रखे हुए है। खरीफ बुवाई में सुधार हुआ है, लेकिन कई राज्यों में अनियमित बारिश फसलों की पैदावार पर भारी पड़ सकती है।

मॉनसून पर अल नीनो का साया!

भारत में मॉनसून का सीज़न इस बार चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। अगस्त के मध्य तक, कुल बारिश में 13% की कमी आ चुकी है। मौसम विभाग की ताज़ा भविष्यवाणियों के अनुसार, अल नीनो (El Nino) का असर और मज़बूत हो रहा है, जिससे सितंबर के मध्य तक मॉनसून के वापस जाने के समय बारिश और भी कम हो सकती है।

आम तौर पर, अगस्त तक मॉनसून से अच्छी बारिश की उम्मीद होती है, लेकिन इस साल पैटर्न कमजोर होता दिख रहा है। भारतीय मौसम विभाग (India Meteorological Department) और निजी मौसम एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि इस बदलाव के चलते देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश की मात्रा में बड़ा अंतर देखा जा रहा है। यह असमान वितरण अब अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

कहाँ कितनी हुई बारिश?

देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश की कमी एक गंभीर मुद्दा है। उत्तर-पश्चिम भारत में 12% की कमी दर्ज की गई है, लेकिन स्थिति अन्य जगहों पर ज़्यादा गंभीर है। दक्षिण प्रायद्वीप (South Peninsula) में 21% की कमी है, जबकि पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत (East and North-East India) में सबसे ज़्यादा 27% की कमी का सामना करना पड़ रहा है। बारिश के इन क्षेत्रीय अंतरों का फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ता है, जिससे स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (Food Supply Chain) पर भी प्रभाव पड़ता है।

कृषि क्षेत्र के लिए क्या हैं मायने?

खेती-किसानी के लिहाज़ से स्थिति मिली-जुली है। खरीफ फसलों की बुवाई (Kharif Sowing) में इस सीज़न की शुरुआत की तुलना में सुधार हुआ है और बुवाई का अंतर 1% से भी कम रह गया है। लेकिन, अब असली चुनौती फसलों की पैदावार (Crop Yields) और मिट्टी में नमी (Soil Moisture) की है। अगर महत्वपूर्ण फसलों जैसे चावल, दालें और तिलहन को उनके बढ़ने के अहम दौर में पर्याप्त बारिश नहीं मिली, तो उनकी कुल उपज कम हो सकती है। कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित कंपनियों के निवेशक इन हालातों पर करीब से नज़र रख रहे हैं, क्योंकि कम उपज से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं।

अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर?

मौसम के इन पैटर्न का असर कई सेक्टरों पर पड़ता है। फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों और ट्रैक्टर व दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों की कमाई काफी हद तक ग्रामीण इलाकों की खरीद क्षमता पर निर्भर करती है। अगर मौसम की मार से फसलें खराब हुईं और किसानों की आय प्रभावित हुई, तो इन सेक्टर्स में मांग पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, ऊर्जा (Energy) सेक्टर भी जलाशयों के जल स्तर पर नज़र रख रहा है, क्योंकि कम बारिश से जलविद्युत (Hydropower) उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे थर्मल पावर की मांग बढ़ सकती है और ऊर्जा की लागत भी बढ़ सकती है।

आगे क्या?

आने वाले कुछ हफ़्ते बेहद अहम होंगे। बाज़ार के लिए सबसे बड़ा सवाल खाद्य महंगाई (Food Inflation) के आंकड़ों पर पड़ने वाला असर है, जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India) अपनी ब्याज दर नीति तय करते समय ध्यान देता है। निवेशक सितंबर के मध्य में जब मॉनसून उत्तर-पश्चिम भारत से हटना शुरू करेगा, तब तक अंतिम फसल अनुमानों (Harvest Projections) और सरकारी उत्पादन आंकड़ों के बारे में अपडेट का इंतज़ार करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.