El Niño का कहर! 111 जिलों पर सूखे का खतरा, खरीफ फसल पर मंडराए संकट के बादल

AGRICULTURE
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
El Niño का कहर! 111 जिलों पर सूखे का खतरा, खरीफ फसल पर मंडराए संकट के बादल

देश के **111 जिलों** को सूखे का हाई रिस्क जोन घोषित किया गया है, जिनमें से **69 जिलों** में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई है। ऐसे में चालू खरीफ सीजन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिससे फसल की पैदावार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है।

अल नीनो का असर, खरीफ सीजन पर मंडराया संकट

अल नीनो (El Niño) के कारण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के बिगड़ने से भारत का कृषि क्षेत्र अनिश्चितता की ओर बढ़ रहा है। सरकारी आकलन में 111 जिलों को खेती-किसानी के संकट के लिहाज से हाई-प्रायोरिटी डिस्ट्रिक्ट्स (High-Priority Districts) माना गया है। चिंता की बात यह है कि इनमें से कई इलाकों में सिंचाई का कवरेज 25% से भी कम है, जिसका मतलब है कि किसान खरीफ फसलों के लिए पूरी तरह मॉनसून की बारिश पर निर्भर हैं।

बारिश की कमी वाले जिले

1 जून से 15 जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक, इन हाई-प्रायोरिटी जिलों में से 69 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। इनमें से 12 जिलों में तो हालात बहुत गंभीर हैं, जहां बारिश अपने सामान्य स्तर से 60% या उससे भी ज्यादा कम है। यह पानी की कमी ऐसे समय में आई है जब धान, दालें और तिलहन जैसी खरीफ की मुख्य फसलों की बुवाई का सबसे अहम वक्त है।

राज्यों पर असर और सूखे की चिंता

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 22 में से 10 जिले ऐसे हैं जहां बारिश कम हुई है। इसके बाद छत्तीसगढ़ का नंबर आता है, जहां 9 जिले इसी समस्या से जूझ रहे हैं। मेघालय, कर्नाटक, झारखंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे कई राज्यों में हर हाई-प्रायोरिटी जिले में बारिश सामान्य से नीचे है। नागालैंड में हालात सबसे खराब दिख रहे हैं, जहां 'लोंगलेंग' जिले में सामान्य 439 मिलीमीटर की तुलना में सिर्फ 0.2 मिलीमीटर बारिश हुई है, जो 99% की भारी कमी है।

आर्थिक और खाद्य सुरक्षा पर असर

जहां देश के ज्यादातर हिस्सों में सूखे का खतरा है, वहीं मुंबई सिटी और पालघर जैसे कुछ इलाकों में सामान्य से बहुत ज्यादा बारिश हो रही है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। लेकिन ज्यादातर चिह्नित जिलों के लिए मुख्य चिंता फसल की पैदावार में कमी की है। जब इन इलाकों में कृषि उत्पादन घटता है, तो खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं और लाखों किसानों की आय कम हो सकती है। निवेशक अक्सर इन मॉनसून के ट्रेंड्स पर कड़ी नजर रखते हैं, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में कंज्यूमर गुड्स, फर्टिलाइजर और ट्रैक्टरों की मांग खरीफ की फसल पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर इसका अंतिम असर मॉनसून सीजन के बाकी महीनों में बारिश के पैटर्न और सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों को सरकारी मदद पर निर्भर करेगा।

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