भारत अब फूड प्रोक्योरमेंट के लिए डेटा-ड्रिवन मॉडल अपना रहा है। सरकार के 'Digital Agriculture Mission' का मकसद बर्बादी को कम करना है, जिससे लॉजिस्टिक्स, कोल्ड चेन और एग्री-टेक कंपनियों के लिए बड़े मौके बन रहे हैं।
दुनियाभर में फूड सप्लाई चेन अब मैनुअल से हटकर रियल-टाइम डेटा सिस्टम की ओर बढ़ रही है। सैटेलाइट इमेजिंग, मौसम का पूर्वानुमान और लॉजिस्टिक्स ट्रैकिंग के जरिए फूड बर्बादी को रोकने की कोशिश की जा रही है। वैश्विक स्तर पर लगभग 30% खाना स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट के दौरान ही खराब हो जाता है। भारत में, 'Digital Agriculture Mission' इस जटिल सेक्टर में एफिशिएंसी लाने का काम कर रहा है।
क्यों जरूरी है डिजिटल बदलाव?
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में इस बात पर जोर दिया गया है कि पारंपरिक तरीके अब काफी धीमे और इनएफिशिएंट हो गए हैं। फसल कटाई के समय स्टोरेज में भारी भीड़ लग जाती है। प्रेडिक्टिव डिजिटल टूल्स के जरिए अब यह अनुमान लगाना आसान होगा कि कितना स्टॉक आएगा और उसे खेत से मंडी तक कैसे तेजी से पहुंचाया जाए।
इन कंपनियों को होगा फायदा
अब इंडस्ट्री का फोकस केवल खरीद (procurement) पर नहीं, बल्कि बेहतर डेटा हैंडलिंग और साइबर सुरक्षा पर भी है। ऐसी कंपनियां जो:
- कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करती हैं
- एग्री-टेक के जरिए किसानों और रिटेलर्स को जोड़ती हैं
- लॉजिस्टिक्स में तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं
ये कंपनियां सप्लाई चेन की रीढ़ बन रही हैं और इनके प्रॉफिट मार्जिन में सुधार होने की पूरी उम्मीद है।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि, राह इतनी आसान नहीं है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और शुरुआती तौर पर आने वाला भारी खर्च (implementation cost) बड़ी चुनौती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी तकनीक को पुराने सिस्टम के साथ कितनी कुशलता से जोड़ पाती हैं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला कैपिटल खर्च उनके मुनाफे पर कितना असर डालता है।
