भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर में नकली कीटनाशकों का बोलबाला है। डेटा के अनुसार, बाजार का **33%** हिस्सा नकली है, जिससे हर साल **10 मिलियन टन** अनाज का नुकसान हो रहा है। यह अवैध व्यापार न केवल किसानों को कर्ज के जाल में धकेल रहा है, बल्कि लिस्टेड कंपनियों के मुनाफे और बाजार हिस्सेदारी पर भी खतरा पैदा कर रहा है।
भारत के कृषि क्षेत्र में नकली कीटनाशकों का एक बड़ा शैडो मार्केट चल रहा है। इंडस्ट्री डेटा के मुताबिक, देश में बिकने वाले कुल कीटनाशकों में से लगभग 33% उत्पाद नकली या मिलावटी हैं। इसका सीधा असर फसल की बर्बादी के रूप में सामने आता है, जिससे सालाना 10 मिलियन टन खाने का नुकसान हो रहा है। किसानों के लिए यह घाटे का सौदा है, क्योंकि नकली प्रोडक्ट न केवल पैसा बर्बाद करते हैं, बल्कि पूरी फसल को नष्ट करके उन्हें कर्ज के बोझ तले दबा देते हैं।
कंपनियों के लिए बड़ा रिस्क
UPL, PI Industries और Coromandel International जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह एक सीधा बिजनेस खतरा है। संगठित कंपनियों को इन अनब्रांडेड और सस्ते नकली उत्पादों से मुकाबला करना पड़ता है। नकली इनपुट्स के इस्तेमाल से जब फसलें खराब होती हैं, तो किसान की भविष्य में खरीदारी की क्षमता भी कम हो जाती है। अब इन कंपनियों को अपनी ब्रांड इक्विटी बचाने के लिए एंटी-काउंटरफीटिंग तकनीक, डिजिटल ट्रेसिबिलिटी और फील्ड मॉनिटरिंग पर भारी खर्च करना पड़ रहा है।
सरकारी नियम और भविष्य की राह
Insecticides Act, 1968 के बावजूद, ग्रामीण इलाकों में सप्लाई चेन का बिखरा हुआ नेटवर्क निगरानी को कठिन बनाता है। नकली उत्पाद बनाने वाली कंपनियां आरएंडडी (R&D) और रेगुलेटरी कंप्लायंस पर खर्च नहीं करतीं, जिससे वे असली ब्रांडों की तुलना में काफी सस्ता माल बेच पाती हैं।
अब निवेशक इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि बड़ी कृषि कंपनियां सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए क्या कदम उठाती हैं। QR कोड्स और ब्लॉकचेन आधारित ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए अब कंपनियां अपने डिस्ट्रिब्यूशन चैनल्स को सुरक्षित कर रही हैं। आगे चलकर सरकार द्वारा रिटेल लाइसेंसिंग को सख्त करने और डिजिटल ट्रांसपेरेंसी के नए नियमों पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि ये कदम एग्रोकेमिकल सेक्टर के भविष्य और कंपनियों के रेवेन्यू पर बड़ा असर डालेंगे।
