India की Food Security पर Big Threat!
IIED की इस ज़ोरदार स्टडी में भारत के लिए एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते ग्लोबल टेम्परेचर के कारण India की खाद्य सुरक्षा (Food Security) पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यह केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्टडी ग्लोबल फूड सिस्टम में मौजूद बड़ी खामियों को भी उजागर करती है।
Food Security Score में भारी गिरावट का अंदेशा
स्टडी में भारत का मौजूदा 'फूड सिक्योरिटी इंडेक्स' 5.31 बताया गया है, जो कि ग्लोबल एवरेज 6.74 से काफी नीचे है। चिंता की बात यह है कि अगर दुनिया का औसत तापमान 2°C तक बढ़ता है, तो भारत का यह स्कोर घटकर 4.52 तक पहुँच सकता है। यह सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के असमान असर को दर्शाता है, जिससे खासकर सब-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्र सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे। जहाँ आइसलैंड जैसे देश (9.26 का स्कोर) काफी लचीले (resilient) हैं, वहीं अफगानिस्तान (3.31) और सोमालिया (1.29) जैसे देशों की हालत पहले से ही बेहद नाज़ुक है।
Global Supply Chains पर बढ़ता दबाव
यह रिपोर्ट इस बात पर भी ज़ोर देती है कि कैसे दुनिया भर की सप्लाई चेन आपस में जुड़ी हुई हैं। इसका मतलब है कि अगर किसी एक प्रमुख कृषि क्षेत्र में मौसम संबंधी कोई बड़ी गड़बड़ होती है, तो उसका असर वैश्विक खाद्य बाजारों में 'वोलेटिलिटी' (volatility) पैदा कर सकता है। यहाँ तक कि G7 देशों की खाद्य सुरक्षा पर भी इसका असर दिखेगा, अमेरिका जैसे देशों के स्कोर में भी भारी गिरावट का अनुमान है।
सिर्फ Economic Growth काफी नहीं
स्टडी यह भी बताती है कि केवल आर्थिक विकास (Economic Growth) ही इस चुनौती से निपटने के लिए काफी नहीं है। भले ही प्रति व्यक्ति GDP में बढ़ोतरी से खाद्य सुरक्षा में मामूली सुधार आए, लेकिन क्लाइमेट शॉक से निपटने की सिस्टम की क्षमता (resilience) अभी भी कमज़ोर है। यह स्पष्ट है कि वित्तीय समृद्धि के बावजूद, खाद्य प्रणालियाँ बार-बार आने वाले जलवायु संकटों का सामना करने के लिए पर्याप्त मज़बूत नहीं हैं।
Systemic Risks और Future Resilience
सबसे बड़ा ख़तरा ग्लोबल फूड सप्लाई चेन की अंदरूनी कमज़ोरी है, जिसे जलवायु परिवर्तन और भी बदतर बना रहा है। IIED के अनुसार, खासकर कम आय वाले और संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों में खाद्य प्रणालियों में 'सिस्टमिक वीकनेस' (systemic weaknesses) मौजूद हैं, जिनमें बार-बार आने वाले जलवायु झटकों को झेलने की क्षमता कम है। इन "गंभीर आहार संबंधी अस्थिरता" (serious dietary instability) के अनुमान अरबों लोगों के लिए एक आसन्न खतरा पैदा करते हैं।
IIED की क्लाइमेट रेसिलिएंस की डायरेक्टर, रितु भारद्वाज का कहना है कि यह रिसर्च हमें इन प्रभावों को समझने और समाधान खोजने में मदद करती है। हमें अपनी खाद्य प्रणालियों में लचीलापन (resilience) बढ़ाना होगा, कृषि पद्धतियों में विविधता लानी होगी और 'क्लाइमेट-स्मार्ट' टेक्नोलॉजी में निवेश करना होगा। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और ज़रूरतमंद देशों को वित्तीय सहायता देना, उनकी खाद्य अवसंरचना को मज़बूत करने और वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थिर करने के लिए महत्वपूर्ण है। एग्रीकल्चर सेक्टर में भी अब ऐसे खिलाड़ी अच्छा कर रहे हैं जो टिकाऊ प्रथाओं (sustainable practices) और मज़बूत सप्लाई चेन को प्राथमिकता दे रहे हैं।