India Agriculture Crisis: मौसम की मार से फसलें बर्बाद, खाने-पीने की चीजें हुईं महंगी!

AGRICULTURE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India Agriculture Crisis: मौसम की मार से फसलें बर्बाद, खाने-पीने की चीजें हुईं महंगी!
Overview

भारत का कृषि क्षेत्र इन दिनों गंभीर जलवायु संकट का सामना कर रहा है। मौसम की मार और तापमान में **1°C** की बढ़ोतरी से राष्ट्रीय फसल उपज में **8%** तक की कमी आ सकती है। खराब बारिश इन झटकों को और बढ़ा रही है, जिससे किसानों की आय घट रही है और खाने-पीने की चीजों के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं। यह महंगाई की मार देश की आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बन गई है।

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फसल उत्पादन पर सीधा असर

एक नई एनालिसिस (analysis) के मुताबिक, तापमान में 1°C की बढ़ोतरी भारत की औसत फसल उपज को 8% तक कम कर सकती है। अप्रत्याशित बारिश के साथ मिलकर यह बढ़ता तापमान सिर्फ खेतों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिरता के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। ये जलवायु झटके (climate shocks) फूड इन्फ्लेशन (food inflation) को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे नीति निर्माताओं के लिए अर्थव्यवस्था को संभालना और ब्याज दरों को तय करना मुश्किल हो गया है।

किसानों और उपज का हाल

रिसर्च (research) में पाया गया कि 1°C तापमान बढ़ने से राष्ट्रीय फसल उपज में लगभग 8% की कमी आती है। वहीं, 20% बारिश की कमी से भी उपज 8.2% घट जाती है। पिछले पांच दशकों में 563 जिलों की 10 प्रमुख फसलों का अध्ययन करने वाले रिसर्चर (researchers) बताते हैं कि ये तत्काल प्रभाव तो सिर्फ शुरुआत हैं। चावल और गेहूं जैसी फसलों के लिए दीर्घकालिक नुकसान, अल्पकालिक आंकड़ों से 35% से 66% अधिक हो सकता है, जिसमें 80% से ज्यादा नुकसान किसी जलवायु घटना के 2 साल के भीतर ही देखने को मिल जाता है। बाजरा (pearl millet) विशेष रूप से कमजोर है, जहाँ तापमान बढ़ने से उपज 19% तक गिर जाती है, और मक्का (maize) में यह 16% से अधिक है। हालांकि दुनिया भर में कुछ फसलों को कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के उच्च स्तर से थोड़ा फायदा हो सकता है, मक्का और सोयाबीन की उपज पहले ही जलवायु परिवर्तन के कारण गिर चुकी है। भारत की लगभग 40% आबादी कृषि पर निर्भर है, इसलिए उपज में यह कमी एक बड़ा आर्थिक झटका है।

अर्थव्यवस्था पर गहरा असर: कीमतें और GDP

फसल की कम पैदावार का सीधा मतलब है किसानों की आय में कमी और खाने-पीने की चीजों की ऊंची कीमतें। भारत जैसे देश के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, जहां खाने-पीने की चीजें महंगाई के सूचकांक (inflation index) का एक बड़ा हिस्सा हैं। हाल के दिनों में मौसम संबंधी गड़बड़ी के कारण सब्जियों की महंगाई 37-42% तक उछल चुकी है, जिसका मुख्य कारण टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलों पर पड़ा असर है। एशियन डेवलपमेंट बैंक (Asian Development Bank) का अनुमान है कि अगर तापमान वृद्धि को नहीं रोका गया तो जलवायु परिवर्तन के कारण 2100 तक भारत को 8.7% तक जीडीपी (GDP) का नुकसान हो सकता है। ऊंची फूड इन्फ्लेशन (food inflation) लोगों की खरीद क्षमता को कम करती है, गरीब परिवारों पर सबसे ज्यादा बोझ डालती है, और महंगाई की उम्मीदों को प्रभावित करके ब्याज दरों के प्रबंधन को मुश्किल बनाती है। वर्तमान अनुमान भी फूड प्राइस (food prices) और ग्लोबल मार्केट्स (global markets) से जुड़े इन्फ्लेशन रिस्क (inflation risks) की ओर इशारा कर रहे हैं।

भारत की कृषि: एक प्रमुख कमजोरी

भारत की अर्थव्यवस्था इस कारण से विशेष रूप से कमजोर है क्योंकि यह भारी मात्रा में कृषि, विशेषकर वर्षा-आधारित खेती पर निर्भर करती है। जबकि वैश्विक अनाज की उपज अक्सर कुल मिलाकर बढ़ी है, यह क्षेत्रीय जोखिमों और अधिक बार होने वाली चरम मौसम की घटनाओं को छुपाती है। 2030 तक, सीमित वार्मिंग के साथ भी वैश्विक मक्का की उपज 6% तक गिर सकती है, जिसमें भारत जैसे स्थानों पर और भी खराब प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। जलवायु घटनाओं से होने वाला तीव्र नुकसान अगले झटके से पहले अनुकूलन (adaptation) के लिए बहुत कम समय छोड़ता है। एफएओ (FAO) गर्मी को खाद्य प्रणालियों के लिए एक 'जोखिम गुणक' (risk multiplier) कहता है, जो भारत को सबसे आगे रखता है, खासकर चावल के लिए, जो 70% आबादी का मुख्य भोजन है। भारत के पास हीट एक्शन प्लान (heat action plans) और बीमा जैसी व्यवस्थाएं हैं, लेकिन केवल अनुकूलन (adaptation) ही काफी नहीं है; उत्सर्जन (emissions) को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चीन जैसे देश जलवायु कार्रवाई को राष्ट्रीय योजनाओं में एकीकृत कर रहे हैं, जबकि भारत को अपने विविध और जलवायु-संवेदनशील कृषि क्षेत्र में अनुकूलन (adaptation) को समन्वित करने की एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

आगे का रास्ता: अनुकूलन और शमन

इन चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि, खाद्य आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता के लिए समन्वित रणनीतियों की आवश्यकता है। एफएओ (FAO) और एडीबी (ADB) गर्मी प्रतिरोधी फसलों का उपयोग करने, मौसम की बेहतर चेतावनी प्रणाली, सिंचाई में सुधार और किसानों को बेहतर वित्तीय सहायता देने का सुझाव देते हैं। एडीबी (ADB) किसानों को गर्मी और कीटों से निपटने में मदद करने के लिए फसल स्वास्थ्य और पैदावार बढ़ाने वाली परियोजनाओं का समर्थन कर रहा है। हालांकि, बढ़ते वैश्विक तापमान से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर मजबूत अनुकूलन उपायों (adaptation measures) और वैश्विक उत्सर्जन (emissions) में कटौती के प्रयासों दोनों की आवश्यकता होगी, ताकि खराब आर्थिक प्रभावों को रोका जा सके और भविष्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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