भारत का डेरी उद्योग, जो दुनिया में सबसे बड़ा है, अब जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है। बढ़ते तापमान और हीट स्ट्रेस (Heat Stress) के कारण पशुओं के दूध देने की क्षमता कम हो रही है, जिससे किसानों की आय पर भारी दबाव आ गया है। यह उद्योग 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका का जरिया है।
उत्पादन और पशु स्वास्थ्य पर असर
जलवायु परिवर्तन, खासकर बढ़ती गर्मी, भारत के डेरी उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। देश का दूध उत्पादन, जो 2024-25 में लगभग 248 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। लेकिन, लगातार पड़ रही भीषण गर्मी और उमस के कारण उच्च-उपज वाले पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी उत्पादकता पर बुरा असर पड़ रहा है।
जब तापमान बढ़ता है, तो क्रॉस-ब्रीड (Crossbreed) वाले पशु खुद को ठंडा रखने में संघर्ष करते हैं। इसके चलते वे कम खाते हैं और ज्यादा पानी पीते हैं। यह शारीरिक तनाव दूध उत्पादन से ऊर्जा को हटा देता है, जिससे सीधे तौर पर उत्पादन में गिरावट आती है। रिसर्च बताती है कि भीषण गर्मी के दौरान दूध उत्पादन में 10% तक की कमी आ सकती है। अकेले उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में, इस जलवायु-प्रेरित गिरावट से सालाना ₹1,200 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है। उत्पादन घटने के अलावा, उद्योग को पशुओं की प्रजनन क्षमता में कमी और मृत्यु दर में वृद्धि जैसे दीर्घकालिक जोखिमों का भी सामना करना पड़ रहा है, जो छोटे किसानों के लिए बड़ी पूंजी का नुकसान कर सकता है।
सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य और संसाधनों पर दबाव
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे प्रमुख दूध उत्पादक राज्य इन बदलते मौसम के पैटर्न के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। चारे और पानी की मौजूदा कमी इस चुनौती को और बढ़ा रही है। डेरी फार्मिंग में पानी की बहुत जरूरत होती है, और इन क्षेत्रों में भूजल स्तर नीचे जाने के कारण, पानी के संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ने से परिचालन लागत बढ़ सकती है। गर्मी से परेशान पशुओं को अधिक पोषण की जरूरत और गुणवत्तापूर्ण चारे की घटती आपूर्ति का यह मेल, छोटे किसानों और संगठित डेयरी सहकारी समितियों दोनों के मुनाफे को कम कर सकता है।
उद्योग के लिए बचाव की रणनीतियाँ
इन जोखिमों को कम करने के लिए, डेरी उद्योग 'क्लाइमेट-स्मार्ट' (Climate-Smart) तरीकों को अपना रहा है। इसमें बेहतर वेंटिलेशन और कूलिंग के लिए बने शेल्टर (Shelter) का निर्माण और पशुओं को हीट स्ट्रेस से निपटने में मदद करने के लिए मिनरल-युक्त चारा (Mineral-rich feed) देना शामिल है। साथ ही, गिर (Gir) और साहीवाल (Sahiwal) जैसी स्वदेशी, गर्मी-सहिष्णु नस्लों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है, जो कुछ आयातित क्रॉस-ब्रीड किस्मों की तुलना में उच्च तापमान के प्रति स्वाभाविक रूप से अधिक सहनशील हैं। किसानों को आने वाली हीट वेव (Heatwave) के बारे में चेतावनी देने वाले टेक्नोलॉजी-आधारित एडवाइजरी सिस्टम (Advisory system) भी शुरुआती प्रबंधन में मदद के लिए तैनात किए जा रहे हैं।
डेरी इकोसिस्टम में निवेशक और हितधारक, जिनमें संगठित डेयरी कंपनियां और फीड निर्माता शामिल हैं, संभवतः इस बात पर नजर रखेंगे कि ये अनुकूलन उपाय कितनी प्रभावी ढंग से लागू किए जाते हैं। इन पर्यावरणीय दबावों के बावजूद, क्षेत्र की लगातार आपूर्ति मात्रा और गुणवत्ता बनाए रखने की क्षमता, उद्योग की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए मुख्य निगरानी बिंदु बनी हुई है।
